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डाकखाने में पड़ी अनपहुंची राखियां और लिफाफे

कुछ राखियाँ…

कुछ राखियों को लिफाफे नहीं मिले और कुछ लिफाफों को राखियाँ. कुछ पर पते ही नहीं थे. यह कविता उन राखियों की कहानी है, जो कभी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सकीं और अब रक्षा के बंधन से मुक्त हो चुकी हैं.

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