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माँ एक दैवीय शक्ति

दिनभर की भागदौड़ के बाद भी जाह्नवी के मन में अपनी नन्ही बेटी की यादें बेचैनी बनकर उमड़ती रहीं। अंधेरी राहों पर अकेले चलती हुई माँ की यह यात्रा सिर्फ घर लौटने की नहीं, बल्कि मातृत्व की उस दैवीय शक्ति का प्रमाण थी जो हर बाधा को पार कर जाती है। जब मन सच्चा हो, तो ईश्वर भी मददगार बनकर रास्ते में उतर आते हैं।

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संदूक भर जीवन

घर के पिछले कमरे में रखा वह पुराना संदूक अब एक वस्तु नहीं रहा, वह मानो माँ के जीवन की पूरी कथा समेटे बैठा है। उसमें मायके की यादें हैं, विवाह की रस्मों के निशान हैं, और मातृत्व के पहले क्षणों की सोंधी गंध अब भी बसी है। हर वस्तु, हर दस्तावेज़ किसी बीते समय की गवाही देता है — मनीऑर्डर का पन्ना, साइकिल की रसीद, गाँव का ढहता इतिहास।
माँ के झुर्रियों वाले हाथ जब उसे छूते हैं, तो उनमें फिर वही स्फूर्ति लौट आती है, जैसे वर्षों पीछे लौट गई हों। और मैं, उस संदूक को निहारते हुए, महसूस करती हूँ कि उसमें सिर्फ़ माँ का ही नहीं, मेरा भी जीवन धीरे-धीरे सिमट आया है — तस्वीरों, कपड़ों और दस्तावेज़ों के रूप में। यही तो है “संदूक भर जीवन।”

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मां…

“मॉं” में माँ को जीवन का आधार, हृदय की आवाज़ और आत्मा का सहारा बताया गया है। माँ केवल काया नहीं, बल्कि माया, अनुशासन, संस्कार और ईश्वर की आराधना का प्रतीक हैं। बच्चे की किलकारी, परिवार का बंधन और घर की यादें माँ की खुशी और शक्ति का हिस्सा हैं। कविता यह दर्शाती है कि माँ का अस्तित्व, उनका स्नेह और उनका मार्गदर्शन जीवन की हर परिस्थिति में अनमोल हैं और उनके नाम का पन्ना कभी फटता नहीं।

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माँ का स्वरूप

माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।

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मेरी माँ 

मेरी माँ घर से बाहर तो जाती हैं, लेकिन घर को घर पर छोड़ नहीं पातीं। उनकी गृहस्थी उनकी परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहती है। रसोई उनके लिए वह जगह है, जहाँ बच्चे जैसी मासूमियत और स्नेह बसता है। लोग कह सकते हैं कि वह सिर्फ एक गृहिणी हैं, पर मेरी माँ केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।
उन्होंने मुझे इतिहास, भूगोल और गणित की बारीकियाँ, साहस, सहिष्णुता और समग्र दृष्टि दी। लगभग सभी विषयों का ज्ञान और जागरूकता उन्होंने मुझे प्रदान की। इस पूरी प्रक्रिया में मेरे पिता भी मेरे और माँ के विकास में साथ रहे।

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वृद्धाश्रम में खिड़की के पास बैठी एक बुजुर्ग भारतीय माँ, हाथ में बेटे की फोटो, आंखों में इंतज़ार और दर्द

मस्‍त हवा का इक झौंका

यह कविता मां और बच्चों के प्रेम और यादों की भावनाओं को उजागर करती है। जीवन में अलगाव, पालन-पोषण और अंततः मातृत्व के अद्भुत बंधन को दर्शाती यह कविता भावनात्मक और मार्मिक है। प्रत्येक पंक्ति में माँ और बच्चे के बीच के गहरे प्यार और यादों का सौंदर्य दिखाई देता है।

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सिंगल मदर अपनी बेटी को पढ़ाते हुए, संघर्ष और प्यार का भावुक दृश्य

माँ की तपस्या, बेटी की उड़ान

“एक माँ ने अपने सारे सपनों को चुपचाप समेटकर अपनी बेटी के भविष्य के नीचे रख दिया. कभी उसने खुद को डॉक्टर के रूप में देखा था, लेकिन हालात ने उसे उस मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ उसे अपने अरमानों से ज्यादा अपनी बेटी के सपनों को चुनना पड़ा. उसने बिना किसी सहारे, बिना किसी शिकायत के हर मुश्किल को अपनाया और हर दिन सिर्फ एक ही लक्ष्य के साथ जीती रही अपनी बेटी को उड़ान देना.

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…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए

इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”

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