मेरी माँ 

मेरी माँ घर से बाहर तो जाती हैं, लेकिन घर को घर पर छोड़ नहीं पातीं। उनकी गृहस्थी उनकी परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहती है। रसोई उनके लिए वह जगह है, जहाँ बच्चे जैसी मासूमियत और स्नेह बसता है। लोग कह सकते हैं कि वह सिर्फ एक गृहिणी हैं, पर मेरी माँ केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।
उन्होंने मुझे इतिहास, भूगोल और गणित की बारीकियाँ, साहस, सहिष्णुता और समग्र दृष्टि दी। लगभग सभी विषयों का ज्ञान और जागरूकता उन्होंने मुझे प्रदान की। इस पूरी प्रक्रिया में मेरे पिता भी मेरे और माँ के विकास में साथ रहे।

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वृद्धाश्रम में खिड़की के पास बैठी एक बुजुर्ग भारतीय माँ, हाथ में बेटे की फोटो, आंखों में इंतज़ार और दर्द

मस्‍त हवा का इक झौंका

यह कविता मां और बच्चों के प्रेम और यादों की भावनाओं को उजागर करती है। जीवन में अलगाव, पालन-पोषण और अंततः मातृत्व के अद्भुत बंधन को दर्शाती यह कविता भावनात्मक और मार्मिक है। प्रत्येक पंक्ति में माँ और बच्चे के बीच के गहरे प्यार और यादों का सौंदर्य दिखाई देता है।

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हश्र..

आज वही देवतुल्य बेटा, जिसके जन्म पर पूरा घर-आँगन गूँज उठा था, सरे-बाज़ार नंग-धड़ंग खड़ा है—इज़्ज़त के नाम पर। जिस बेटे के लिए माँ ने मन्नतों के धागे बाँधे थे, दादी ने मिठाइयाँ बाँटी थीं और बधाई गीत गाए थे, आज वही बेटे के संस्कार समाज के सामने नंगे खड़े हैं।

कभी पोते के स्वागत में पतोहू को चुनरी ओढ़ाई गई थी, बुआ ने देहरी पर नेग के लिए अड़ गई थी, भाभी के कंगन उतरवाए गए थे और दादा ने सातों पत्तलों पर भोज करवा शान से जश्न मनाया था। किन्नरों को बुलाकर डैडी ने चाँदी के सिक्के उछाले थे। यह सब उस इकलौते कुलदीपक के नाम पर हुआ, जिसे देवपुत्र की तरह पूजा गया।

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सिंगल मदर अपनी बेटी को पढ़ाते हुए, संघर्ष और प्यार का भावुक दृश्य

माँ की तपस्या, बेटी की उड़ान

“एक माँ ने अपने सारे सपनों को चुपचाप समेटकर अपनी बेटी के भविष्य के नीचे रख दिया. कभी उसने खुद को डॉक्टर के रूप में देखा था, लेकिन हालात ने उसे उस मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ उसे अपने अरमानों से ज्यादा अपनी बेटी के सपनों को चुनना पड़ा. उसने बिना किसी सहारे, बिना किसी शिकायत के हर मुश्किल को अपनाया और हर दिन सिर्फ एक ही लक्ष्य के साथ जीती रही अपनी बेटी को उड़ान देना.

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…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए

इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”

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