भावनात्मक कहानी
किस्मत का खेल
अपने माता-पिता को आग में खोने के बाद अरुण बिल्कुल अकेला रह गया। एक साड़ी की दुकान में काम करते हुए उसने चोरी रोककर अपने मालिक का विश्वास जीत लिया। मालिक ने उसकी ईमानदारी देखकर उसे अपनी बेटी निशा के साथ विवाह के लिए कहा। किस्मत से उजड़ा अरुण का घर फिर से बस गया, और तीनों एक खुशहाल परिवार बन गए।
पूर्वाग्रह
इवा की साइकिल गायब थी और रोती हुई बच्ची बार-बार पूछ रही थी.“मम्मा, किसने ली?”
मनोरमा को तुरंत शक उसी कचरा उठाने वाले मनोज पर गया, जिसने कुछ दिन पहले साइकिल मांगने की बात कही थी। शिकायत पर मनोज को सामने लाकर खड़ा किया गया, वह केवल इतना बोल सका. “मैडम, मैंने नहीं ली… CCTV देख लीजिए।” उसी समय अरविंद का फोन आया और सच सामने आ गया.साइकिल तो उन्होंने ही मरम्मत के लिए भेजी थी।.मनोरमा के भीतर अपराधबोध भर गया. शक उसका था, गलती उसका पूर्वाग्रह।
अधूरी बात, अधूरा जीवन…
शारीरिक बीमारियों का इलाज तो हम कर लेते हैं लेकिन वह बीमारियां जो दिमाग के अंदर ही अंदर पनपतीं रहती हैं, किसी को दिखाई नहीं देती है, सही समय पर उनको पहचान कर, स्वीकार करना और इलाज ना किया जाए तो उनका रूप किस कदर बिगड़ेगा …..
विवेक की मानसिक स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी । मां को लेकर वह असुरक्षित महसूस करता था । अपनी बात ना मां को ना किसी और को समझा पाया ।
मां उसकी इस बीमारी को समझ तो रही थी लेकिन इससे पहले कि वह इलाज ढूंढती …..
सोना
प्रसव के बाद थकी-हारी गीतू मायके से किसी के आने की उम्मीद लगाए चिंतित है। आर्थिक तंगी और दूरी के कारण उसे लगता है कि कोई नहीं आएगा। मन में यह भी कसक है कि काश बेटी होती तो पिता का बोझ हल्का होता। तभी सासू माँ फोन पर सबको खुशी से बेटे के जन्म की खबर देती हैं और मालिशवाली को बुलाकर कहती हैं — सवा महीने बाद बड़ा फंक्शन होगा। गीतू अपनी चिंता बताती है कि मायके से सोना-चांदी आदि कैसे आएंगे, तो सास lovingly कहती हैं — “सोना-चांदी तो दादा-दादी की ओर से आएगा, तुमने हमें पोते के रूप में खरा सोना दिया है।” यह सुनकर गीतू भावुक होकर अपनी सास से लिपट जाती है अपनी दूसरी माँ की तरह।
10 रुपये की कीमत
आज़ादी के बाद के दिनों में दो घनिष्ठ मित्र थे .एक धनी, एक साधारण।
एक दिन निर्धन मित्र ने 10 रुपये उधार लिए और फिर अचानक परिवार सहित कहीं चला गया।
25 साल बाद लखनऊ के एक होटल में दोनों अचानक मिले वही साधारण मित्र अब होटल मालिक बन चुका था।उसने कहा “मैं वो 10 रुपये वापस नहीं दूँगा, क्योंकि उन्हीं 10 रुपयों ने मुझे आज ये पहचान दी है।”
कासे कहूं
घरेलू हिंसा की मार झेलती मालती अपने दर्द को सहजता से बयान कर देती है, जबकि उसकी मालकिन मिसेज सुजैन अपने ही जख्म छुपाए बैठी हैं। कहानी निम्न वर्ग और उच्च वर्ग के बीच पनपती एक समान पीड़ा को उजागर करती है. जहां मार खाने की आदत समाज के नजरिए से तय होती है, लेकिन दर्द हर औरत का एक-सा होता है।
वो लड़की
सोमेश की कंपनी में नया प्रोजेक्ट शुरू हुआ था, इसलिए अब उसे ऑफिस में ज़्यादा देर तक रुकना पड़ता था. इस बात से उसका मन खिन्न हो रहा था. दस बजे की मेट्रो से उतरकर वह ऑटो की ओर बढ़ा. जैसे ही वह ऑटो में बैठा, वैसे ही एक खुशबू का झोंका उसकी नाक से टकराया.
रुको, मुझे भी ले चलो, लगभग हांफते हुए उस लड़की ने कहा.
वो खूबसूरत चेहरा, हिरणी सी आंखें, बाल हवा में बिखरे हुए, साड़ी पहने हुए थी. कहते-कहते ही वह बैठ गई.अरे! ऐ, इन साहब ने ऑटो रुकवाया है, तुम किसी और में चली जाओ, ऑटो वाले ने डपटते हुए कहा.
सन्नाटे में चीख
इमारत के छोटे से फ़्लैट में रहने वाले सक्सेना दंपती की ज़िंदगी एक-दूसरे के इर्द-गिर्द सिमटी थी। लेकिन एक सुबह अचानक आई आंटी की मौत ने सब कुछ बदल दिया। लकवे से ग्रस्त अंकल अपनी आँखों के सामने सब कुछ होते हुए देख भी कुछ नहीं कर पाए। यह हृदयविदारक घटना अकेले रह रहे बुज़ुर्गों की असहायता और समाज की अनदेखी पर गहरे सवाल खड़े करती है।
