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खयालों की दहलीज पर…

बड़े अदब के साथ अल्फाज़ खड़े हैं, खयालों की दहलीज पर। मौन से हारे हुए हुड़दंग भीतर ही भीतर मच रहे हैं। जज़्बातों से सराबोर, अल्फाज़ मचल तो रहे हैं, पर तमीज़ ने उन्हें रोक रखा है, इस तरह कि वे सरेआम बाहर नहीं आ पा रहे।इसलिए बेचारे अल्फाज़ सहम गए हैं, किसी नकाबपोश औरत की तरह। अब उन्होंने अपने अभिव्यक्ति का एक जरिया ढूंढ लिया है। इसी वजह से आजकल उनकी आंखें भी बोलने लगी हैं—वो भी, अल्फाज़ों के परे।

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मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।

श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।

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मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

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प्रेरणा की स्वामिनी

यह कविता वेदना को संबोधित करते हुए लिखी गई है। कवि पूछता है कि क्यों हृदय थका हुआ और मन उद्विग्न है, क्यों विरह की बदली आँसुओं से भरी रहती है और क्यों उसे आकाश का कोई कोना भी नसीब नहीं होता।

वह वेदना को प्रेरणा की देवी मानकर कहता है कि सभी लोग तुम्हें आधुनिक मीरा कहते हैं—क्या तुम्हें भी विषपान करना पड़ा? कवि चाहता है कि जैसे गणपति प्रथम पूज्य हैं, वैसे ही वह वेदना को पूज्य मानकर आराधना करे, क्योंकि काव्य-जगत में वही उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा है।

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“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

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टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

गहन भावनाओं और रात के सन्नाटे के माध्यम से जीवन की नाजुकताओं और बेचैनियों को बयान करती है। लेखक की नींद में खलल डालने वाली घटनाओं के माध्यम से यह व्यक्त किया गया है कि किस तरह अचानक आने वाली परिस्थितियाँ हमारी मानसिक शांति और हौसलों पर असर डालती हैं। रात भर दिल और चाँद दोनों रोते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का मिश्रण प्रस्तुत करता है। “इत्र सी सुगंध” और “तितलियों के पंखों पर रंग” जैसी छवियाँ जीवन की सुंदरता और नाजुकता को दर्शाती हैं, 

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चिड़िया-सी उड़ान

मैं फिर से बच्ची बनना चाहती हूँ — बिना डर, बिना संकोच। खुलकर हँसना-रोना, बारिश में भीगना और सिर्फ माँ-पापा के दुलार में खो जाना। दुनिया की सोच से परे, कुछ पल के लिए सिर्फ अपने होने को जीना चाहती हूँ।”

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तुम कितना बदल गए हो

“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”

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छप्पन वर्ष

“पचपन नहीं… छप्पन बरस हो गए हमारी शादी को।”वृद्धा ने हँसते हुए कहा, और वृद्ध भी मुस्करा दिए। सुबह से ही फोन की ट्रिन-ट्रिन ने उन्हें परेशान किया था, पर अब समझ आया. यह बच्चों की शुभकामनाओं की आवाज़ें थीं।
यादों की परतें खुलीं—इलाहाबाद के दिन, बच्चों की हंसी, कंधों पर बैठा कर दिखाई गई चौकी, रजाई के भीतर की मूँगफली… और आज वही बच्चे हिसाब मांगते हैं, शिकायतें करते हैं। पर इस सुबह आदित्य के गुलदस्ते और अर्चना की हंसी नेवृद्ध दंपति की आँखों को बारिश की बूँदों-सा चमका दिया।

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आज़ादी स्त्री की…

उस स्त्री की आत्मा कहती है—”मैंने हमेशा यही सोचा था कि मैं आज़ाद हूँ। पर हर पड़ाव पर बंधनों ने मुझे जकड़ लिया।
कभी भाई ने मेरे वस्त्रों पर नियंत्रण किया, कभी सास ने मेरी इच्छाओं को ढकने के लिए पल्ले और क्लिप्स थमा दिए। जीवन भर मैंने परंपराओं, रिश्तों और सामाजिक मान्यताओं के नाम पर अपने अस्तित्व को ढका। और फिर मृत्यु आई। सफेद चादर में लिपटी मैं, अपनी ही देह को राख होते देखती रही।

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