माँ का स्वरूप

माँ के दिव्य स्वरूप और मातृत्व, शक्ति, और ममता की अनुभूति का सुंदर चित्रण करती है। इसमें कवि माँ को आकाश सा विशाल हृदय और धरती का धीरज रखने वाली मानते हैं, जो बिना मांगे सब देती हैं और हर समय अपने भक्तों के साथ रहती हैं। कवि माँ से सुख-दुख में साथ रहने, हर सांस में उनका आशीर्वाद पाने और जीवन में उनके दर्शन करने की प्रार्थना करता है। यह कविता भक्ति, श्रद्धा और आत्मीय स्नेह का प्रतीक है, जो माँ की महिमा और उसके संरक्षण की भावना को उजागर करती है।

Tags:

Read More

देहरियों के पार..

एक स्त्री (या प्रतीक्षारत आत्मा) आकाश की नीली छाँव और हरियाली की गोद में खड़ी है। वह एक वृक्ष का सहारा लिए सदियों से प्रतीक्षा कर रही है—अपने चितचोर (प्रिय/प्रियतम) की खोज में। उसकी आँखें अपलक रास्ता निहार रही हैं और कान पदचाप की आहट सुनने को आतुर हैं।

समय गुज़रता गया, परंतु उसकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई। वह खुद को एक प्यासी नदी की तरह अनुभव करती है, जो कभी अमृत-सरीखी धारा बहाती थी, पर अब सूख चुकी है। फिर भी उसके भीतर यह विश्वास बना हुआ है कि उसका प्रिय अवश्य आएगा। यही एक सपना उसकी आँखों की रोशनी और मन की गर्माहट बनाए रखता है।

Read More

हिंदी पर बिंदी

हम सभी मिलकर हिंदी को अपना अत्यंत महत्वपूर्ण भाषा बनाना चाहते हैं। केवल अंग्रेज़ी के सहारे हमारा देश नहीं चमक सकता, इसलिए हमें हिंदी को आगे लाना होगा। आज से हम अपने सभी कार्य हिंदी में करेंगे और इसे देश की सर्वश्रेष्ठ पहचान दिलाएंगे। जब हम सभी हिंदी में संवाद करेंगे और अपने काम इसी भाषा में करेंगे, तभी देश का विकास वास्तविक रूप से संभव होगा। यह हमारा दृढ़ संकल्प है कि अंग्रेज़ी को राजभाषा मानने के बजाय हम हिंदी को अपनाएँगे और इसे सभी के बीच फैलाएँगे।

Read More

दिलों को जोड़ती, नफरतों को तोड़ती हिंदी

हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।

Read More

ईश्वर को देखा

ईश्वर को किसी ने प्रत्यक्ष नहीं देखा, पर वह हर ओर विद्यमान है। साँसों की लय, धड़कनों की गति, सूरज की रोशनी, चाँद की चाँदनी, फूलों की मुस्कान और नदी की रागिनी—सब उसी विराट ऊर्जा के रूप हैं। हम सभी उसी अनंत चेतना के कण हैं, जो समय के साथ बहते रहते हैं। मोक्ष कोई शून्य नहीं, बल्कि जीवन का सार है, जो सृष्टि से तादात्म्य स्थापित करने पर मिलता है। जब हृदय में करुणा, प्रेम और संवेदना खिलते हैं, तभी ईश्वर का सच्चा अनुभव होता है।

Read More

मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

Read More

प्रेरणा की स्वामिनी

यह कविता वेदना को संबोधित करते हुए लिखी गई है। कवि पूछता है कि क्यों हृदय थका हुआ और मन उद्विग्न है, क्यों विरह की बदली आँसुओं से भरी रहती है और क्यों उसे आकाश का कोई कोना भी नसीब नहीं होता।

वह वेदना को प्रेरणा की देवी मानकर कहता है कि सभी लोग तुम्हें आधुनिक मीरा कहते हैं—क्या तुम्हें भी विषपान करना पड़ा? कवि चाहता है कि जैसे गणपति प्रथम पूज्य हैं, वैसे ही वह वेदना को पूज्य मानकर आराधना करे, क्योंकि काव्य-जगत में वही उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा है।

Read More

स्त्री है त्रिशक्ति

स्त्री वास्तव में त्रिशक्ति का प्रतीक है—वह शारदा की ज्ञानमयी छवि है, शिवा की त्याग और साहस भरी ऊर्जा है और श्री की समृद्धि और करुणा से भरपूर है। उसका स्वरूप कभी पीपल की ठंडी छाँव-सा शीतल है तो कभी सावन की झड़ी-सा तरल और जीवनदायी। ठिठुरती सर्दियों में वह गुनगुनी धूप बन जाती है। सृष्टि की शुरुआत भी उसी से होती है और अंत भी उसी में समाया हुआ है।

Read More
खिड़की के पास खड़ी स्त्री, किसी की प्रतीक्षा में खोई हुई, उदास और भावनात्मक दृश्य

एक प्रतीक्षा

यह कविता एक ऐसी वियोगिनी की कहानी है, जो प्रेम में पूरी तरह समर्पित होकर भी अपने प्रिय के साथ की प्रतीक्षा में जीवन बिताती है। हर प्रयास, हर त्याग और हर आशा के बावजूद अधूरापन बना रहता है। यह रचना प्रेम, प्रतीक्षा और नियति के बीच संघर्ष को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।

Read More

तुम कितना बदल गए हो

“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”

Read More