जय मां गंगा

“गंगा उदास है… मेरी गंगा उदास है।”
भगीरथ की तपस्या से धरती पर उतरी माँ गंगा आज मनुष्य के कर्मों से मलीन हो उठी है। कभी संतों के चरणों में बहकर जग का संताप हरने वाली मंदाकिनी, आज प्रदूषण और उपेक्षा से व्यथित है। अपनी ही संतान के हाथों अपवित्र होती इस पावन धारा का मौन करुण क्रंदन — हमारी संवेदनहीनता का प्रमाण बन गया है।यह कविता केवल गंगा की वेदना नहीं, बल्कि उस सभ्यता का विलाप है, जिसने अपनी ही संस्कृति के प्रतीक को आघात पहुँचाया है।

Read More

खुशबू से बंधा पहला प्यार

यह कविता मानो खुशबुओं का एक जीवन वृत्तांत है। हर स्मृति, हर अनुभव एक विशेष सुगंध से जुड़कर अमर हो गया है। पहली बारिश की मिट्टी की महक, प्रियतम की मीठी बातों की महक, किताबों से उठती खुशबू, हाथों में महंदी की गंध, गहनों में समाया पसीना, खिड़की से आती रातरानी की महक और तन पर चंदन की सुगंध—सब कुछ उसके प्रेम और साथ के अनुभवों से गुँथा हुआ है। यह केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उन अदृश्य अनुभूतियों का बयान है जो इंद्रियों से परे जाकर हृदय में स्थायी छाप छोड़ देती हैं। हर खुशबू, एक स्मृति बनकर जीती है और हर स्मृति में प्रेम की गहराई झलकती है।

Read More

दिल को छूती मौन की गूँज…

“निशिगंधा की महक से जग उठा संसार, आंखों में बह रही गंगा और यमुना की धाराएँ। मिट्टी के दीपों की रौशनी में प्रार्थना और शांति पंचतत्व में विलीन हो रही हैं, और एक गीत हर दिल को छूते हुए गूँज रहा है।”

Read More

“अस्तित्व”

“दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों की राहों में भी, छोटे-छोटे क्षण और यादें हमारे अस्तित्व को जीने का साहस और संबल देती हैं। गुप्तधन जैसे नन्हा दीपक, उड़ते पंछी, यादों की कुप्पी—ये सब हमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और अपने अस्तित्व के साथ जुड़ने का अनुभव कराते हैं।

Read More

प्रकृति…

प्रकृति हर पल हमें कुछ न कुछ सिखाती रहती है। ठंडी हवाएँ हमें कहती हैं कि चलते रहो, कभी मत रुको और अपना लक्ष्य पाकर ही ठहरो। चहचहाते पक्षी यह संदेश देते हैं कि परिस्थितियाँ जैसी भी हों, मुस्कुराते रहो और जीवन का आनंद लो। घड़ी की टिक-टिक हमें याद दिलाती है कि समय की कद्र करो, क्योंकि एक बार बीता हुआ वक्त कभी लौटकर नहीं आता। रिमझिम बारिश की बूँदें सब्र करने का पाठ पढ़ाती हैं और बताती हैं कि धैर्य का फल सदैव मीठा होता है। वहीं, जगमगाते जुगनू यह सीख देते हैं कि अंधेरों में भी रोशनी तलाशनी चाहिए। सच तो यह है कि प्रकृति अनजाने में ही हमें जीवन के गहरे सत्य सिखा देती है, लेकिन अक्सर हम इंसान इतने नासमझ होते हैं कि उन्हें समझ नहीं पाते।

Read More

सितंबर अहा!

सितंबर आते ही ऋतु-संधि का मधुर प्रकाश धरती पर उतर आता है। बरखा की विदाई और शरद की मुस्कान एक साथ झलकने लगती है। खेतों में धान और मक्का लहलहाते हैं, तो आँगनों में गेंदा और कमल अपनी सुगंध बिखेरते हैं। यह महीना केवल प्रकृति के बदलते रंगों का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सवों का भी साक्षी है। पितृपक्ष की श्रद्धा और गणपति का उल्लास, दोनों एक साथ वातावरण को भक्ति और आनंद से भर देते हैं। नीलम-से गगन में पुखराज-सा सूरज चमकता है और मन के आँगन में एक नया उजास जगाता है। सचमुच, सितंबर नवजीवन का संदेश लेकर आता है।

Read More

धारा और संकल्प

कंकड़ और पत्थरों ने मिलकर नदी की दिशा मोड़ने का संकल्प लिया। उन्होंने उसके प्रवाह को रोकने के लिए बाँध बनाए, टीले खड़े किए और पहाड़ बनने का सपना देखा। लेकिन नदी – जो स्वयं प्रवाह की देवी है – न रुकी, न झुकी। वह ठोकरें खाती रही, पर हर बाधा के पार एक नया मार्ग खोजती रही। अपनी गति को कभी न छोड़ते हुए, उसने प्यासों को जल, खेतों को हरियाली और जीवन को उम्मीद दी। अंततः, जब सारे पत्थर थक गए और टीले मिट्टी बन गए, नदी अपनी मंज़िल — समुद्र — तक पहुँच गई। उसने सिद्ध किया कि उसे रोका जा सकता है थोड़ी देर के लिए, पर हमेशा के लिए नहीं। क्योंकि उसका अस्तित्व ही बहते रहने में है।

Read More

बूँदों की पदचाप…

मैं ध्यानमग्न होकर आज वर्षा की बूँदों की पदचाप सुन रही हूँ। ये बूँदें जैसे कोई देववधू बनकर घूँघट काढ़े आई हों और धरती से मधुर आलिंगन कर उसका संताप हर रही हों। मिट्टी में मिलकर अंकुरित होने लगीं, मानो जीवन की नई कोंपलें फूटने लगी हों। पूरी प्रकृति जैसे किसी रचनात्मक क्रीड़ा में सम्मिलित हो गई हो। इन बूँदों ने तन-मन को धोकर शुद्ध कर दिया, और भीतर की Maya को खोज निकाला। प्रत्येक बूँद अब एक मोती बन गई है, जिसे मन सहेज रहा है, मानो किसी गूढ़ तत्व से मिलने का जाप हो रहा हो।

Read More

पुराना बरगद का पेड़ 

रिक्त लटका झूला सावन में,
पुराने बरगद के पेड़ में,
ताक रहा है राह को —
ना जाने कब आएंगी बेटियाँ।
पूछ रहा है वो पुराना बरगद का पेड़ —
अब सावन में क्यों नहीं आतीं हैं बेटियाँ?

Read More