जब बदरा रोया…

यह कविता प्रकृति के विनाश पर चिंता और संरक्षण का संदेश देती है। कवि दिखाता है कि जब पर्यावरण आहत होता है, तो धरती की सुंदरता और जीवन का संतुलन दोनों बिगड़ जाते हैं। वह मानव से आग्रह करता है कि जंगल बचाए, प्रदूषण रोके और संसाधनों का संयमित उपयोग करे। अंत में कवि आशा जताता है कि यदि हम प्रकृति से प्रेम करें और उसकी रक्षा करें, तो धरती फिर से हरियाली, सुगंध और आनंद से भर जाएगी।

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नव अंकुर की आस

नवपल्लवित पौधा अपनी कोमल जड़ों से धरती का आशीर्वाद लेकर जीवन की नई शुरुआत करता है। वह नव अंबर और नव भोर के साक्षी के रूप में जन्म लेता है, अपने भीतर जीवन की नयी आस संजोए हुए। चारों ओर फैले उपवन की मधुर सुवास उसे उल्लास से भर देती है। वह अभी शिशु है, पर हर दिन वायु और जल का स्पर्श पाकर बढ़ने की आकांक्षा रखता है।

वह जानता है कि एक दिन वह विशाल वृक्ष बनेगा—जिसकी छाया में संसार विश्राम करेगा, जो अनगिनत जीवों को ऑक्सीजन और जीवनदान देगा। उसका अस्तित्व निःस्वार्थ है, उसका हर अंश किसी न किसी के काम आने वाला है

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दरिया और किनारा

कविता में दरिया को जीवन के संघर्ष और पवित्रता का प्रतीक बनाया गया है। दरिया मस्ती और ऊर्जा के साथ बढ़ती है, अपने रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को पार करती है, किनारों से संबंध बनाए रखती है और दूसरों के कष्ट और पापों को समेटती है। यह अपने गंतव्य की ओर दृढ़ता और गति से बढ़ती है, अंततः समुद्र की विशाल बाहों में विलीन होकर अपने सफर का निष्कर्ष प्राप्त करती है। यह कविता दर्शाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ आएँ, संयम, धैर्य और अपने मूल्यों के साथ मार्ग पर बढ़ते रहना ही सफलता की कुंजी है।

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पुलवामा के बाद की एक माँ की कश्मीर डायरी

यह एक माँ की हिम्मत, आत्मविश्वास और अनुभवों की कहानी है — जो अपने दो बच्चों के साथ अकेले कश्मीर की वादियों में निकल पड़ी। पुलवामा की घटना के बाद जब डर और संदेह ने मन को जकड़ रखा था, तब भी उसने फैसला किया कि ज़िंदगी के इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देगी। डर के उस पार फैली थी बर्फ़ से ढकी पहाड़ों की शांति, मेहमाननवाज़ लोगों का अपनापन और एक माँ के दिल में दर्ज़ हो गई यादों की चमक।

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क्या होता है आखिर

जीवन में सब कुछ पाना शायद ही कभी संभव होता है। हर बार कुछ न कुछ बच जाता है — पूरा भर जाने के बाद भी रिक्तता का अनुभव बना रहता है। यह कुछ ऐसा है जैसे काले बादलों की ओंट में बचा थोड़ा सा पानी, या भोर की हल्की रोशनी में मिली रात की सहमी-सी कहानी।

प्रिय से मिलने के बाद उसका इंतजार, कटे हुए दरख़्त में फूटती नई हरित कोपलें, सुनसान जंगल में पंछियों के घोंसले, मंदिर की मूर्ति को बार-बार निहारने की इच्छा — ये सब दर्शाते हैं कि कुछ भी कभी पूरा नहीं होता। हमेशा कुछ-न-कुछ बच जाता है, आस-पास ही, जिसे महसूस करना और जीना ही जीवन का सच है।

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अमन की जोत फिर जलाना है

यह जीवन बस एक बहाना है — सांसों का आना-जाना, रिश्तों का मतलब और फर्ज़ निभाने की रस्में। अमीरों की थालियाँ भरी हैं, मगर गरीब का निवाला उनसे छिन गया है। मुफ़लिसी की बातें अब किससे कही जाएं, जब ज़माना इतना बेरहम हो गया है।

आईने अब चेहरों को नहीं, दिलों को पढ़ने लगे हैं — नया चेहरा, मगर दिल वही पुराना। विज्ञान के इस दौर में इंसान चाँद पर घर बसाने की सोच रहा है, जबकि ज़मीन पर जंगल सूने और परिंदे बेघर हो गए हैं।

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तुम और मैं : दो छोर, एक डोर

हम कितने अलग हैं — फिर भी साथ हैं।
तुम दिन हो, उजले और स्पष्ट, जबकि मैं रात हूं — रहस्यमयी, गहराई में डूबी हुई।
तुम स्थिर तट की तरह शांत हो, और मैं बहते झरने की तरह बेफिक्र, निरंतर गतिमान।
तुम पर्वत की तरह अडिग और दृढ़ हो, जबकि मैं हवा की तरह चंचल, हर दिशा में बिखरती हुई।

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काश के फूल

डॉ. मंजूलता, प्रसिद्ध साहित्यकार, नोएडा काश! मैं फूल होती काश कातुम्हारे मानस-पटल परपड़ी स्याह परतों परअपने नर्म-नर्म फूलों सेरुई के फाहे-सा ढक देती। ख़्वाहिशें जो तुम्हारीदबी-दबी-सी हैं, उन्हें काश के फूलों केउड़ते-हिलते फाहों सेसजा देती। बिखरते तो ख़्वाहिशों की तरहकाश के फूल भी,पर शरद ऋतु आतेकहाँ रोक पाते खिलनेसे ख़ुद को! तेरे मन में भी…

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बरसात में…

बरसात को जीवन, प्रकृति और मानवीय अनुभवों का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। बारिश की बूंदें पत्तों और फूलों पर मोती की तरह टपकती हैं, बिजली के तारों पर झिलमिलाती हैं और धरती में अमृत जैसी बूंदों के रूप में समा जाती हैं। वहीं, जर्जर मकान ढहते हैं और लोग अपने घरों और यादों को बचाने के लिए प्रयास करते हैं। शहर और गाँव की सड़कों पर बच्चे बारिश में खेलते हैं, नदियाँ अपने भीषण बहाव में सब कुछ बहा लेती हैं, और जानवर तथा पक्षी अपनी परिस्थितियों से जूझते हैं। इसके बीच, बरसात जीवन में रिश्तों, साहस और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करती है। कविता यह दर्शाती है कि बरसात का सौंदर्य और जीवन में उसकी भूमिका पहले जैसी रह गई है, लेकिन अब वह पहले जैसी रूमानी नहीं लगती।

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“लहरों की सखी”

यह कविता आत्मसंवाद और जीवन की गहराई का प्रतीक है। कवयित्री ने लहरों को अपनी सखी — यानी आत्मीय साथी — के रूप में देखा है। लहरें यहाँ सिर्फ समुद्र की गतिशीलता नहीं, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव, भावनाओं की लय और त्मविश्वास की स्थायी धारा का प्रतीक हैं। जब कवयित्री कहती हैं “लहरों को बाहों में समेटे हुए मैं, अथाह समंदर को समेटती हुई”, तो यह अपने भीतर की असीम शक्ति और प्रेम को पहचानने की यात्रा बन जाती है।लहरें उन्हें उनकी परछाई दिखाती हैं, यानी स्वयं से मिलने का अवसर देती हैं।वे जीवन के सफर की गवाह हैं, जो कवयित्री को कभी भटकने या बहने नहीं देतीं. बल्कि उन्हें दृढ़, स्थिर और प्रेममय बनाए रखती हैं।

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