इंतज़ार करता आँगन

चार बेटे होने के बावजूद, उस बुज़ुर्ग दंपत्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेलापन ही नसीब हुआ। सबने अपना-अपना जीवन चुन लिया, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए वे माँ-बाप, जिनकी आँखें अब भी दरवाज़े की ओर टिकी रहती हैं। दादा-दादी अब पोतों की कहानियों और संस्कारों की बातें नहीं कर सकते, क्योंकि वे अब आसपास ही नहीं हैं।

घर की चिंता, इज़्ज़त और नाम की रक्षा अब किसे करनी है — ये सवाल दीवारों से टकराकर लौट आते हैं। माँ-बाप अब खुद को विरह की आग में झोंकने को तैयार हैं, क्योंकि बेटा अब बड़ा हो चुका है, पढ़-लिखकर देश से दूर जा चुका है, अपनी ज़िंदगी बनाने।

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नमन उन पितरों को, जिनसे है हमारी पहचान

पितृपक्ष केवल स्मरण का पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने वाले संस्कारों और धरोहरों का अनुभव है। पितर कहीं दूर नहीं जाते, वे हर आँगन, हर देहरी और हमारे हावभाव तक में बसे रहते हैं। उनकी दी हुई सीख और आशीष ही हमें जीवनभर संबल देती है और हमारी पहचान को सहेजती है।

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हश्र..

आज वही देवतुल्य बेटा, जिसके जन्म पर पूरा घर-आँगन गूँज उठा था, सरे-बाज़ार नंग-धड़ंग खड़ा है—इज़्ज़त के नाम पर। जिस बेटे के लिए माँ ने मन्नतों के धागे बाँधे थे, दादी ने मिठाइयाँ बाँटी थीं और बधाई गीत गाए थे, आज वही बेटे के संस्कार समाज के सामने नंगे खड़े हैं।

कभी पोते के स्वागत में पतोहू को चुनरी ओढ़ाई गई थी, बुआ ने देहरी पर नेग के लिए अड़ गई थी, भाभी के कंगन उतरवाए गए थे और दादा ने सातों पत्तलों पर भोज करवा शान से जश्न मनाया था। किन्नरों को बुलाकर डैडी ने चाँदी के सिक्के उछाले थे। यह सब उस इकलौते कुलदीपक के नाम पर हुआ, जिसे देवपुत्र की तरह पूजा गया।

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छप्पन वर्ष

“पचपन नहीं… छप्पन बरस हो गए हमारी शादी को।”वृद्धा ने हँसते हुए कहा, और वृद्ध भी मुस्करा दिए। सुबह से ही फोन की ट्रिन-ट्रिन ने उन्हें परेशान किया था, पर अब समझ आया. यह बच्चों की शुभकामनाओं की आवाज़ें थीं।
यादों की परतें खुलीं—इलाहाबाद के दिन, बच्चों की हंसी, कंधों पर बैठा कर दिखाई गई चौकी, रजाई के भीतर की मूँगफली… और आज वही बच्चे हिसाब मांगते हैं, शिकायतें करते हैं। पर इस सुबह आदित्य के गुलदस्ते और अर्चना की हंसी नेवृद्ध दंपति की आँखों को बारिश की बूँदों-सा चमका दिया।

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स्त्री का दर्द और समाज की सच्चाई

“स्त्री जब प्रेम में छल खाती है या विवाह में अपमान सहती है, तब उसकी संवेदना टूटी हुई कांच की तरह बिखर जाती है। ममता और त्याग की प्रतिमूर्ति होकर भी वह अधूरी कहानी लिखने पर विवश होती है। कभी अपने बच्चों की गलत परवरिश का दोष भी उसी पर आता है, तो कभी परिवार के विघटन का बोझ भी उसके कंधों पर डाल दिया जाता है। यदि नारी नफ़रतों के बीज बोना छोड़ दे और पुरुष अन्याय पर अपनी सहमति न दे, तभी प्रेम का प्रकाश फैलेगा और समाज में करुणा का पुनर्जन्म होगा। जिस दिन प्रेम हर हृदय में विस्तारित होगा, उस दिन नारी सचमुच लक्ष्मी स्वरूपा बनकर पूजी जाएगी।

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राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग

स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।

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पुराना भारतीय घर, टूटी दीवारें, खाली आँगन और बचपन की यादों का भावुक दृश्य

वो घर मेरा

सालों बाद जब कोई अपने पुराने घर लौटता है, तो दीवारें भी जैसे बोल उठती हैं। यह कविता उसी एहसास को बयां करती है जहां कभी हँसी गूंजती थी, आज वहां खामोशी है, और यादों की नमी हर कोने में बसती है।

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धुंध में धुन

नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”

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घर में उदास बैठा पिता और मोबाइल में व्यस्त बच्चे, बदलते पारिवारिक रिश्तों का दृश्य

बाप रे बाप

यह व्यंग्यात्मक लेख “बाप रे बाप” भारतीय समाज में “बाप” की बदलती छवि और उसकी सामाजिक स्थिति पर तीखा लेकिन हास्यप्रद कटाक्ष करता है। कभी परिवार का केंद्रबिंदु और अनुशासन का प्रतीक रहा “बाप”, अब अपने ही बच्चों और समाज के व्यवहार से हास्यास्पद स्थिति में आ गया है। बेटे बाप के नाम पर ऐश करते हैं, पर उसकी इज्जत नहीं रखते। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक, हर कोई “बाप” बनने की होड़ में है — असली अर्थों में नहीं, बल्कि रुतबे के लिए। लेख एक गहरी सामाजिक विडंबना की ओर इशारा करता है, जहाँ बाप अब ATM, चेकबुक, और ज़रूरत पड़ने पर जेब से निकाली जाने वाली वस्तु बनकर रह गया है।

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