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स्वयंसिद्धा

ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठी मैं अपने भीतर के तूफ़ानों को सुन रही थी। एक युवक आया और बोला. “कितनी भव्य है ये नदी।” मैंने कहा “हाँ, पर इसे बहने के लिए गिरना, टूटना पड़ा है। इसी टूटने में इसकी पहचान है।”

मैंने अपने हाथों को देखा — हर झुर्री जैसे किसी मोड़ का निशान। बोली — “हर औरत के हिस्से में भी एक नदी होती है, जो बहती है, कभी बाढ़ बनती है, कभी शांत, लेकिन अंत में अपने सागर तक पहुँच जाती है।” वो चुप रहा, बस मुझे ऐसे देखा जैसे कोई नदी को देखता है। अब वो मुझसे अपने उत्तर खोजता है, और मैं मुस्कुरा देती हूँ क्योंकि जवाब किताबों में नहीं, नदियों में बहते हैं। मैं स्वयंसिद्धा हूँ. अपने भीतर के ब्रह्मपुत्र को स्वीकार कर चुकी हूँ। अब मुझे कहीं पहुँचना नहीं, बस बहते रहना है।

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