नन्हीं डलिया में बताशे

यह कविता बीते दौर की उस मासूमियत और सामाजिक गर्मजोशी को याद करती है, जो अब आधुनिक जीवन की भागदौड़ में खो गई है। कभी गलियों में बच्चों की डुगडुगी, उपवनों में शर्माती कलियाँ, और दोस्तों का एक पुकार पर दौड़ आना — ये सब अब दुर्लभ हो गए हैं। कवि ने भावपूर्ण शब्दों में यह अहसास जताया है कि समय के साथ रिश्तों, संवेदनाओं और सादगी की वो चमक अब धुंधला चुकी है।

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रिश्ते कुछ जाने कुछ अनजाने से

रिश्ते कुछ जाने-पहचाने होते हैं और कुछ अनजाने। कुछ जन्म से मिलते हैं तो कुछ समय और प्रयास से बनते हैं। ये कलियों की तरह कोमल और फूलों की तरह नाज़ुक होते हैं, लेकिन धैर्य और निभाने से लंबे समय तक टिके रहते हैं। समझ की डोर से बंधे ये रिश्ते जीवन के तूफ़ानों में भी नहीं टूटते। सुख-दुख में ये हमेशा साथ चलते हैं और एक-दूसरे को सहारा देते हैं। सच्चे रिश्ते प्रेम, समर्पण और ईमानदारी से पनपते हैं, और हर चुनौती का सामना मिलकर करते हैं। कठिनाइयों में ये हौसला बढ़ाते हैं और संघर्षों को जीत में बदल देते हैं। मन की उथल-पुथल में भी ये शांति देते हैं और आंधियों में भी अडिग खड़े रहते हैं। निराशा के क्षण आते हैं, फिर भी सच्चे रिश्ते कभी टूटते नहीं, क्योंकि इन्हें जोड़ती है भरोसे, करुणा और आपसी देखभाल की ताक़त।

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आओ चाय बनाए …

“आओ चाय बनाए” एक भावनात्मक आमंत्रण है, जिसमें चाय बनाने की प्रक्रिया को एक प्रेमपूर्ण और सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह कविता सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि आत्मीयता, मिलन और घरेलू सौंदर्य की प्रतीक है। मसालों की सुगंध, शक्कर की मिठास और चाय की पत्ती की उबाल के साथ मित्रता और अपनापन भी घुलता है। यह कविता हर उस व्यक्ति को बुलाती है जो रिश्तों की गर्माहट को महसूस करना चाहता है — एक प्याले चाय के साथ।

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