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दो सितारों का मिलन…42 साल बाद

बयालीस साल बाद हुई यह मुलाकात सिर्फ दो पुराने साथियों के मिलने भर की नहीं थी, बल्कि उन दिनों की धड़कनों को फिर से जी लेने जैसा अनुभव थी। इंदौर की गलियों में साइकिल से खबरों की तलाश में दौड़ते हुए बिताए गए वे दिन यादों की परतों से झाँकने लगे — अनंत चतुर्दशी की रातें, दंगों के बीच रिपोर्टिंग की बेचैनी, और श्मशानघाटों से जुटाई गई खबरों की जिम्मेदारी।

रतलाम के घर में बैठे हुए, चाय की प्यालियों के बीच समय जैसे ठहर गया था। हम दोनों बीच-बीच में ठहाके लगाते, कभी पुराने नामों को याद करते और कभी आज की पत्रकारिता पर अफसोस जताते। प्रदीप जब अपनी खबरों के डिजिटलाईजेशन की बात कर रहे थे, तो मन में एक अजीब कसक उठी — कुछ चीज़ें वक्त के साथ सँभाल लेनी चाहिए थीं।

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अजब-गजब के रिश्ते

मैंने कई रिश्तों से गुज़रते हुए बहुत कुछ देखा है। मैंने उन लोगों को देखा जो दिल और जान से मरने वाले थे, पर उनके ही सीने में खंजर उतरते थे। जो लोग महफ़िलों में सीना चौड़ा करके सामने आते थे, उन्हें पीठ में वार करते देखा है। रात भर चादर की सिलवटों को और सुबह उसी चादर को सीधा होते भी देखा है। मैंने उन लोगों को भी देखा जो ताउम्र जख्म देते रहे, और फिर उनके कंधों पर सिर रखकर रोते थे। जिंदगी में बहारों का मौसम लेकर आने वाले लोगों को अक्सर ऐसे लोगों को विरानियों में बदलते हुए देखा है।

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