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सागर और मन

सागर और मन का रिश्ता गहरा है। जब चाँद की छाँव में ऊँची तरंगें उठती हैं, तो उनका झिलमिलाना किसी स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। लहरें आकाश को छूने की चाह में उमड़ती हैं, लेकिन अंततः अपने ठिकाने पर लौटकर शांत हो जाती हैं।

सागर ने समय के प्रवाह से यही सीखा है—हर क्षण, हर रंग बदलता रहता है। कभी वह मचलता है, तो कभी थमकर भीतर के बुझते-सुलगते अलाव को सँजोए रहता है। चाँदनी की चादर में ढकी लहरें रात की खामोशी में खो जाती हैं। वे कभी सौम्य स्वर बनती हैं, तो कभी प्रबल गूँज की तरह उभरती हैं।

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