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पुलवामा के बाद की एक माँ की कश्मीर डायरी

यह एक माँ की हिम्मत, आत्मविश्वास और अनुभवों की कहानी है — जो अपने दो बच्चों के साथ अकेले कश्मीर की वादियों में निकल पड़ी। पुलवामा की घटना के बाद जब डर और संदेह ने मन को जकड़ रखा था, तब भी उसने फैसला किया कि ज़िंदगी के इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देगी। डर के उस पार फैली थी बर्फ़ से ढकी पहाड़ों की शांति, मेहमाननवाज़ लोगों का अपनापन और एक माँ के दिल में दर्ज़ हो गई यादों की चमक।

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कश्मीर की तस्वीर

पिछले कुछ वर्षों से अधूरी रह रही कश्मीर यात्रा की इच्छा इस बार पूरी हुई। गर्मियों की छुट्टियों में जब शर्ली और जेमी दोनों घर पर थे, तो परिवार ने दृढ़ निश्चय किया — अबकी बार कश्मीर पक्का! २१ मई को हमने जम्मू के लिए ट्रेन पकड़ी और वहां से शुरू हुआ श्रीनगर की ओर रोमांचक सफर, जिसमें चेनानी-नाशरी सुरंग की तकनीकी भव्यता और घाटियों की नैसर्गिक सुंदरता ने मन मोह लिया। रास्ते की कठिनाइयों के बावजूद श्रीनगर की समतल घाटी का सौंदर्य जैसे हर थकान को हर लेता है। होटल अल-शिमाघ में गर्मजोशी से स्वागत के बाद शुरू हुई हमारी असली कश्मीरी यात्रा — डल झील, मुगल बाग, लाल चौक और हिमालयी सौंदर्य से सराबोर सोनमर्ग, गुलमर्ग, पहलगाम की रोमांचकारी यात्राएं।

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