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भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

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