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ऐ जिन्दगी

यह कविता एक आत्मीय संवाद की तरह है जिसमें जीवन से धीमे चलने की विनती की गई है। इसमें अकेलेपन, कठिन रास्तों और यादों की संगत को बहुत सहज भाव से व्यक्त किया गया है। कवयित्री कहती है कि जिन्दगी ने अपने हिस्से की धूप तो दी, पर अब वह ठंडी हवाओं और तन्हा रास्तों के बीच खुद को समेटे हुए है। बावजूद इसके, भीतर कहीं एक उम्मीद अब भी जीवित है कि शायद कोई राह ज़रूर होगी जो उसे उसके “जीवन” तक पहुँचा देगी।

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धूप आती है….

सांझ ढलते ही मन बोझिल हो उठता है। लौटते परिंदों की फुर्ती और घोंसले तक पहुँचने की चाह सिखाती है कि ठिकाना ही असली सुकून है। लेकिन यह सांझ अब न गले लगाती है, न मुस्कान भरती है—बस तन चलता रहता है और मन सूखे पत्तों-सा झरता है। खाने की मेज़ पर अब बर्तनों का कोई राग नहीं, न ही निवालों की कोई चिरौरी। पेट भरना भी बस एक कवायद रह गया है। फिर भी गलियारों से आती धूप पतझड़ से मन को बसंत की ओर ताकने पर मजबूर कर देती है। आँखों से बहता नमकीन पानी चुपचाप तकिए में समा जाता है। सुबह आती है, थकी-हारी, पर वही रोज़मर्रा की भागदौड़ मन को थोड़ी राहत देती है। दिन के उजाले में नए चेहरे और कहानियाँ मिलती हैं, और धीरे-धीरे सांझ से रात तक का मलाल भी उतरने लगता है।

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कभी मैं याद आऊँ… तो चले आना

कभी-कभी कुछ यादें सिर्फ प्रश्न नहीं होतीं, वे उत्तर भी नहीं होतीं—वे प्रार्थनाओं जैसी होती हैं, जो किसी के दिल की दहलीज़ पर दीप की तरह जलती रहती हैं। यह कविता नहीं, बल्कि प्रेम की उस शांत पुकार का दस्तावेज़ है जो बिना किसी आरोप या उत्तरदायित्व के, बस यादों की नम परतों में छुपा होता है। जब भी मन थक जाए, कोई मुस्कान याद आ जाए, या बारिश में घुलने की इच्छा हो, तब लौट आने की स्वीकृति देने वाली यह पुकार, प्रेम की सबसे कोमल और निस्वार्थ अभिव्यक्ति है। प्रेम, जहाँ आना जाना नहीं, बस “होना” ही काफ़ी होता है।

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मन की आवाज़ और मुसाफ़िर दिल…

दूरी, अनिश्चितता और आत्मसंघर्ष से भरे इन भावों में एक अकेली रूह की पुकार है – जो कभी अपने प्रिय को पुकारती है, कभी जीवन की राहों से सवाल करती है, तो कभी अंधेरों में खुद को एक जुगनू की तरह जलता हुआ महसूस करती है। ये पंक्तियाँ उस मन की आवाज़ हैं जो भटकते हुए भी उम्मीद नहीं छोड़ता।

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प्रेम…हुई शाम उनका ख़्याल आ गया… 🎵🎶

रात की निस्तब्धता में प्रेम का प्रश्न भीतर गूंज रहा था। संगीत की सधी स्वर लहरियाँ मन को ऐसे छू गईं कि सब तर्क-वितर्क, प्रश्न-उत्तर उस तकिए पर ढुलकी एक बूंद में विलीन हो गए… जैसे प्रेम समझाने का नहीं, केवल महसूस करने का विषय हो।

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वापसी के रास्ते….

“जब हम इश्क़ की राह पर चलते हैं, तो सब कुछ नया, ताज़ा और सुंदर लगता है। लेकिन वही राह जब लौटने की बनती है, तो हर पेड़, हर हवा, हर मोड़ अजनबी सा लगता है। इश्क़ के रास्ते पर हम खुद को कहीं पीछे छोड़ आते हैं… और वापसी की राह असल में उसी खोए हुए ‘ख़ुद’ की तलाश बन जाती है।”

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पत्थरों को तराशते-तराशते भावनाहीन हो गया एक शिल्पकार

ये मूर्तिकार

यह मूर्तिकार, जो छेनी-हथौड़ी से पत्थरों को तराशते-तराशते खुद भी एक पाषाण शिला सा बन गया है। उसके भीतर का प्रेम कहीं उसकी बनाई मूर्तियों में समा गया, या कहें कि बुत बनकर रह गया। कल जो प्रेम से लबालब था, आज वह भीतर से सूख चुका है—दरकती पपड़ी जैसा। समय की नश्वरता को समझते हुए भी उसने उसे नज़रअंदाज़ किया, क्योंकि उसके जीवन में अब बस औज़ारों का ही महत्व रह गया है। यही औज़ार उसके जीवनयापन का साधन हैं, उसकी भूख मिटाने का माध्यम हैं—उसका एकमात्र साथ।

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सवाल मैं, जवाब में सन्नाटा

वो सबके लिए मोहब्बत बरसाता है, लेकिन मुझे किसी तमाशे की तरह अनदेखा कर देता है। उसकी रहमतें जब हर गली को भिगोती हैं, तब भी मैं सूखी ही रह जाती हूँ। जिसे कभी पलकों पर बिठाया था, वही मेरी आँखों में कांटे चुभो जाता है। मैं अपने सवालों में उलझी रहती हूँ, और वो जवाबों में सन्नाटा छोड़ जाता है। दूसरों की ज़िंदगी में वो सौ रंग भर देता है, मगर मेरे हिस्से हमेशा अंधेरा ही आता है। वो खुद भीड़ का हिस्सा बनकर चल पड़ता है, और मुझे तन्हाई में छोड़ जाता है। जब भी लौटता है शहर से, “गौरी”, तो बस उदासी का कोई नया किस्सा दे जाता है।

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सम्मान की सूखी रोटी

मैंने तुम्हारी बातों में आकर अपना परिवार छोड़ दिया और तुमने मुझे धोखा दिया,” प्रियांशी के स्वर में टूटे हुए सपनों की गूंज थी। लेकिन जवाब में जो मिला, वो और भी ज़्यादा चुभने वाला था – “तुम जैसी औरतों की कोई इज्जत नहीं…”

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जब काली बिल्ली ने मेरा मन पढ़ लिया

“यह कहानी एक अकेले रहने वाले व्यक्ति और एक रहस्यमयी काली बिल्ली के बीच बनते एक अनोखे, गहरे और आत्मीय रिश्ते की है। कुछ दिनों का यह साथ न सिर्फ उसकी बिल्ली पालने की इच्छा पूरी करता है, बल्कि यह एहसास भी देता है कि कभी-कभी जानवर हमारे मन की बात हमसे पहले जान लेते हैं।”

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