gulmohar

मुश्किल है…

यह पाठ जीवन की कठिनाइयों और नैतिक संघर्षों का दर्पण है। यह बताता है कि सही और अच्छा बने रहना जितना सुनने में आसान लगता है, वास्तविकता में उतना ही कठिन है। चाहे परिवार और अपनों के साथ संबंध हों या समाज की अपेक्षाएँ, हमेशा सत्य और अच्छाई के मार्ग पर चलना चुनौतीपूर्ण होता है। लेखक अपने भीतर और बाहरी दुनिया में छिपे संघर्षों को उजागर करता है—अपने अंदर के रावण को पहचानना और उसे नियंत्रित करना, सही और गलत के बीच अंतर समझना, और स्वार्थी दुनिया में सच्चे और अच्छे लोगों की तलाश करना। यह न केवल व्यक्तिगत जुझारूपन का वर्णन है, बल्कि समाज और मनुष्य के अंतर्मन की जटिलताओं की भी गहरी झलक देता है।

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टूटता मानव…

मनुष्य आज अपने ही भीतर टूट रहा है। बिना वजह झगड़े पर आमादा है, जबकि जीने की जद्दोजहद पहले से ही कठिन है। कोई शराब और सिगरेट जैसे नशों में डूबा है, कोई जीवन की खुशियाँ खोकर केवल मरने की प्रतीक्षा कर रहा है।

वह अपने दिल में सिर्फ़ दर्द सँजोए बैठा है और खुद को ही ठुकराता जा रहा है। प्यार के रिश्तों में भी उसे छलावा और धोखा मिलता है, जिससे वह गुनहगार-सा महसूस करता है। समाज में झूठ और धोखे का बोलबाला है, सच्चाई का कोई रखवाला नहीं। ऐसे में आदमी सिर्फ़ होशियार होना सीख गया है, संवेदनाएँ खो बैठा है और संघर्षों में हारकर रोने पर मजबूर है।

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मन के अहाते का पेड़

कृष्णा तिवारी कृति, प्रसिद्ध लेखिका, नागदा जंक्शन (मध्यप्रदेश) खलिश काएक पेड़ लगा हैमन के अहाते मेंखटकता है सुनापनकाश..उसकी फुनगी पर भीकलियाँ आती..पतझड़ के बाद बसंतफिर सावन,बस,, यही सावन..राखी का….नयनों को और सावन कर जातापल्लू में बंधे आशीषधरातें कभी दुआए देहरी परसुनें पेड़ का मनआसमान हों जातावो फल भरी डालियाँझुमती है मन के अहाते मेंमगर दूसरे…

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त्योहार पर घर

घर जाने का नाम आते ही उसके भीतर एक अजीब-सा डर जाग उठता है। डर किसी अनजान रास्ते का नहीं, बल्कि एक बहुत परिचित सवाल का है—
“क्या करते हो आजकल?”यही सवाल उसकी हिम्मत तोड़ देता है। यही वजह है कि वह एक और त्योहार भी अपने छोटे से कमरे में बिताने को मजबूर हो जाता है।उसके चारों ओर बिखरी रहती हैं कुछ पुरानी किताबें, कुछ बर्तन, मेज़ पर रखा टेबल लैंप और कोनों में धुंधले पड़ते सपनों की परछाइयाँ। इन्हीं सबके बीच वह सोचता है कि क्या उसे एक और साल की मोहलत खुद को देनी चाहिए या फिर चुपचाप उन सपनों को यहीं छोड़ देना चाहिए।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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इंतज़ार करता आँगन

चार बेटे होने के बावजूद, उस बुज़ुर्ग दंपत्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेलापन ही नसीब हुआ। सबने अपना-अपना जीवन चुन लिया, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए वे माँ-बाप, जिनकी आँखें अब भी दरवाज़े की ओर टिकी रहती हैं। दादा-दादी अब पोतों की कहानियों और संस्कारों की बातें नहीं कर सकते, क्योंकि वे अब आसपास ही नहीं हैं।

घर की चिंता, इज़्ज़त और नाम की रक्षा अब किसे करनी है — ये सवाल दीवारों से टकराकर लौट आते हैं। माँ-बाप अब खुद को विरह की आग में झोंकने को तैयार हैं, क्योंकि बेटा अब बड़ा हो चुका है, पढ़-लिखकर देश से दूर जा चुका है, अपनी ज़िंदगी बनाने।

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गुज़र जाने के बाद…

तूफ़ान गुजरने के बाद बर्बादी की तस्वीर सामने थी। होश आया तो बस खालीपन और ग़म ही हाथ लगा। मेहंदी का नाम गीतों में मशहूर है, पर दुल्हन की हथेलियों पर उसका रंग तब ही सँवरता है जब वह अपने घर पहुँचती है। ज़िंदगी ने कई ज़ख्म दिए थे, मगर सबसे गहरा घाव तेरे मुकर जाने के बाद ही मिला। डर है कहीं जंगल भी इतिहास न बन जाएं और शजर खो देने पर हमें अपनी भूल पर पछताना न पड़े। अब कनक किससे अपना दिल का हाल कहे—प्यार का नशा तो आता है, पर उसका असर देर से समझ आता है, जब सब कुछ बीत चुका होता है।

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प्रेम का वादा, पीड़ा का सच

नारी का हृदय प्रेम में जितना कोमल होता है, पीड़ा में उतना ही कठोर अनुभवों से गुजरता है। प्रेम से पीड़ा तक का यह सफ़र उसकी संवेदनाओं को भीतर तक झकझोर देता है। धोखा, अपमान और परित्याग उसके आत्म-सम्मान को धज्जी-धज्जी कर देते हैं, कभी-कभी तो उसे जीवन-लीला समाप्त करने की कगार पर पहुँचा देते हैं।

फिर भी वही नारी आँसुओं में भी शक्ति ढूँढ़ लेती है। टूटकर भी वह बिखरती नहीं, बल्कि खुद को गढ़ लेती है—अपनी प्रतिमा, जिसमें प्राण फूँकने के लिए किसी और की आवश्यकता नहीं। यही उसका आत्मविश्वास है, यही उसकी सच्ची शक्ति।

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कर्म हम ऐसा करें…

हर दिन हमारे जीवन में एक नई उमंग और तरंग लेकर आता है। यदि हम अपने कर्म ऐसे करें कि दुनिया हमें देखकर दंग रह जाए, तो यही सच्ची सफलता है। राह में चाहे कांटे हों या शूल, परिस्थितियाँ प्रतिकूल क्यों न हों, सच्चा कर्मवीर अंजाम से नहीं डरता और भूल को कभी दोहराता नहीं। उसका हर काम करने का एक अनोखा और निराला ढंग होता है।

उन्नति की राह पर बढ़ते रहना ही जीवन का ध्येय होना चाहिए। सामने हिमशिखर खड़े हों तो भी उनसे टकराने का साहस रखना चाहिए। आकाश को छूने का जज़्बा होना चाहिए, जैसे उड़ती हुई पतंग। कर्मपथ पर चलते हुए प्रण कभी डगमगाना नहीं चाहिए और न ही ईमान बिकना चाहिए। नए मुकाम हासिल करना और सिर को कभी न झुकाना ही सच्ची जीत है। कर्म ही हमारी काशी-मथुरा हैं, कर्म ही हमारा हाजी मलंग है। यही कर्म हमारी पूजा है, यही कर्म हमारी पहचान है।

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कमला का द्वंद

कमला की कहानी उस हर औरत की दास्तान है जो समाज की रूढ़ियों, अपेक्षाओं और तानों के बीच अपनी पहचान खो बैठती है। सुंदरता, प्यार और त्याग के बावजूद वह केवल “बेटियों की माँ” कहलाकर अपमानित हुई। पति के छोड़ जाने के बाद भी उसने बेटियों की परवरिश अकेले की और जीवन भर सुहागन और विधवा के बीच के द्वंद में पिसती रही। यह कथा समाज की विडंबना को उजागर करती है—जहाँ स्त्री को उसके अस्तित्व से नहीं, बल्कि समाज की बनाई कसौटियों से आँका जाता है।

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