काली राख की बस्ती
कभी-कभी कोई दर्दनाक घटना सुनने भर से ही दिल काँप जाता है। पर जब ऐसा पता चलता है कि वह दर्द किसी ऐसे इंसान के साथ हुआ है जिसे हम रोज़ देखते थे, जिसके बच्चे हमारे सामने खेलते थे,

कभी-कभी कोई दर्दनाक घटना सुनने भर से ही दिल काँप जाता है। पर जब ऐसा पता चलता है कि वह दर्द किसी ऐसे इंसान के साथ हुआ है जिसे हम रोज़ देखते थे, जिसके बच्चे हमारे सामने खेलते थे,
यह कविता अनिद्रा की उस गहरी अवस्था को चित्रित करती है, जहाँ शरीर थक चुका होता है लेकिन मन लगातार सक्रिय रहता है. रात भर जागती सोच, तकिये के नीचे दबी अनकही बातें और स्थिर घड़ी की सुइयाँ जीवन की थकान और मानसिक बोझ को प्रतीकात्मक रूप में सामने लाती हैं. सुबह होने पर भी रात का जागना भीतर बना रहना, आधुनिक मनुष्य की मानसिक बेचैनी को सशक्त रूप से व्यक्त करता है.
आज मन संवाद के लिए तरसता है।
मौन और डिजिटल दुनिया के बीच,
वह तेज़ और धीमी रफ्तार वाला संवाद सिर्फ़ मेरी यादों में बचे हैं। आज मैं अपने पायल की छम-छम और शॉवर की बूंदों में उस मौन जुगलबंदी का अनुभव कर रही हूँ।
आज मन उदास है। रोशनी चुभती है, सितारे दिखना भी नहीं चाहते। वह अकेलेपन में बांसुरी की धुन में शांत होना चाहता है, जहाँ कोई सुनने वाला नहीं और सिर्फ यादें साथ हों।
डायरी के पन्नों में कैद होती हैं वे कहानियां, जो जीवन की मजबूरी और अपमान की गवाही देती हैं। खुला आसमान और उन्मुक्त पंछियों की उड़ान उनके लिए सपना बन जाती हैं, परन्तु उनके शब्द अपनी बेबसी और तिरस्कार की कहानी बयाँ करते हैं।
घर पर रहना पसंद करने वाले लोग दुनिया से कटे हुए नहीं होते, बल्कि वे शांति, भावनात्मक सुरक्षा और आत्म-संतुलन को प्राथमिकता देते हैं. उनका समृद्ध आंतरिक संसार, रचनात्मक सोच और खुद के साथ सहज रहने की क्षमता उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाती है. यह आदत आलस्य नहीं, बल्कि आत्म-देखभाल और संतोष का संकेत है.
तेरे जाने के बाद, फूल खिलते रहे और चाँद उगता रहा, पर दुनिया बेरंग और सपाट दिखने लगी। नदी की कल-कल में संगीत नहीं, बस छलछलाहट सुनाई पड़ने लगी। परिंदों की चहचहाट भी अब चुभने लगी, क्योंकि तुम मुझसे बहुत दूर चली गई। आवाज़ भी दूँ तो शून्य से टकराकर लौट आती है।
हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।
उस दिन उसने कहा-“अब बात नहीं करोगे।”
शब्द ठंडे थे, पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मैं मुस्कुरा दी और कह दिया-“मैं भी बात नहीं करूँगी।”
वास्तव में, हमने पहले ही बातचीत खो दी थी। मैं हर रोज़ उसके पास बैठकर कुछ पल चाहती थी. बस सुनना, समझना, साथ में रहना। लेकिन वह हमेशा जवाब देता रहा, पर कभी वास्तव में मौजूद नहीं था। महँगे तोहफ़े, बड़े रेस्टोरेंट, दिखावटी सुख, कुछ भी मेरे भीतर के खालीपन को भर नहीं सका।