नींद

यह कविता अनिद्रा की उस गहरी अवस्था को चित्रित करती है, जहाँ शरीर थक चुका होता है लेकिन मन लगातार सक्रिय रहता है. रात भर जागती सोच, तकिये के नीचे दबी अनकही बातें और स्थिर घड़ी की सुइयाँ जीवन की थकान और मानसिक बोझ को प्रतीकात्मक रूप में सामने लाती हैं. सुबह होने पर भी रात का जागना भीतर बना रहना, आधुनिक मनुष्य की मानसिक बेचैनी को सशक्त रूप से व्यक्त करता है.

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संवाद और ख़्याल

आज मन संवाद के लिए तरसता है।
मौन और डिजिटल दुनिया के बीच,
वह तेज़ और धीमी रफ्तार वाला संवाद सिर्फ़ मेरी यादों में बचे हैं। आज मैं अपने पायल की छम-छम और शॉवर की बूंदों में उस मौन जुगलबंदी का अनुभव कर रही हूँ।

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कमरे में अकेली व्यक्ति खिड़की के पास बैठा, धुंधली रोशनी में खुद को देखता हुआ, मन में उदासी और अकेलेपन का भाव। कमरे में शांत वातावरण, हल्की धुंध और बांसुरी की कल्पित धुन महसूस होती है।

एकांत की तलाश

आज मन उदास है। रोशनी चुभती है, सितारे दिखना भी नहीं चाहते। वह अकेलेपन में बांसुरी की धुन में शांत होना चाहता है, जहाँ कोई सुनने वाला नहीं और सिर्फ यादें साथ हों।

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Open diary on a wooden desk with yellowed pages and blurred handwritten words, sunlight falling on it, symbolizing confinement, emotional struggle, and the longing for freedom, with a distant view of open sky and flying birds through the window.

डायरी – कुछ कहानियां…

डायरी के पन्नों में कैद होती हैं वे कहानियां, जो जीवन की मजबूरी और अपमान की गवाही देती हैं। खुला आसमान और उन्मुक्त पंछियों की उड़ान उनके लिए सपना बन जाती हैं, परन्तु उनके शब्द अपनी बेबसी और तिरस्कार की कहानी बयाँ करते हैं।

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खामोशी में छुपी एक अलग दुनिया

घर पर रहना पसंद करने वाले लोग दुनिया से कटे हुए नहीं होते, बल्कि वे शांति, भावनात्मक सुरक्षा और आत्म-संतुलन को प्राथमिकता देते हैं. उनका समृद्ध आंतरिक संसार, रचनात्मक सोच और खुद के साथ सहज रहने की क्षमता उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाती है. यह आदत आलस्य नहीं, बल्कि आत्म-देखभाल और संतोष का संकेत है.

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शून्य में गूँजती आवाज़ें

तेरे जाने के बाद, फूल खिलते रहे और चाँद उगता रहा, पर दुनिया बेरंग और सपाट दिखने लगी। नदी की कल-कल में संगीत नहीं, बस छलछलाहट सुनाई पड़ने लगी। परिंदों की चहचहाट भी अब चुभने लगी, क्योंकि तुम मुझसे बहुत दूर चली गई। आवाज़ भी दूँ तो शून्य से टकराकर लौट आती है।

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सर्द रात

एक सर्द रात, एक स्त्री अपने कमरे के कोने में अकेले आंसू बहा रही थी। पति को परमेश्वर मानकर वह सालों तक जुल्म सहती रही। आज, उनके ना रहने के बाद भी वह उस रात की याद से अपने आप को कंपकंपा महसूस करती है।

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सहनशीलता का अभाव और टूटते रिश्ते

हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।

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अब बात नहीं करोगे…

उस दिन उसने कहा-“अब बात नहीं करोगे।”
शब्द ठंडे थे, पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मैं मुस्कुरा दी और कह दिया-“मैं भी बात नहीं करूँगी।”
वास्तव में, हमने पहले ही बातचीत खो दी थी। मैं हर रोज़ उसके पास बैठकर कुछ पल चाहती थी. बस सुनना, समझना, साथ में रहना। लेकिन वह हमेशा जवाब देता रहा, पर कभी वास्तव में मौजूद नहीं था। महँगे तोहफ़े, बड़े रेस्टोरेंट, दिखावटी सुख, कुछ भी मेरे भीतर के खालीपन को भर नहीं सका।

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तुम और तुम्हारी यादें…

उस स्त्री की पीड़ा जो भुलाने की हर कोशिश के बावजूद स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पाती। वादों से भरे प्रेम का अचानक टूट जाना, चुपचाप सहा गया अत्याचार और अकेलेपन में बहते आँसू—सब मिलकर एक ऐसी कहानी रचते हैं जहाँ प्रेम भले ही दूर हो जाए, पर उसकी यादें भीतर ज़िंदा रहती हैं। दूरी के बावजूद दो आत्माएँ एक-दूसरे की प्रतीक्षा में बँधी रहती हैं, जैसे एक ही परिंदे के दो पंख।

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