खामोशी में छुपी एक अलग दुनिया

घर पर रहना पसंद करने वाले लोग दुनिया से कटे हुए नहीं होते, बल्कि वे शांति, भावनात्मक सुरक्षा और आत्म-संतुलन को प्राथमिकता देते हैं. उनका समृद्ध आंतरिक संसार, रचनात्मक सोच और खुद के साथ सहज रहने की क्षमता उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाती है. यह आदत आलस्य नहीं, बल्कि आत्म-देखभाल और संतोष का संकेत है.

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शून्य में गूँजती आवाज़ें

तेरे जाने के बाद, फूल खिलते रहे और चाँद उगता रहा, पर दुनिया बेरंग और सपाट दिखने लगी। नदी की कल-कल में संगीत नहीं, बस छलछलाहट सुनाई पड़ने लगी। परिंदों की चहचहाट भी अब चुभने लगी, क्योंकि तुम मुझसे बहुत दूर चली गई। आवाज़ भी दूँ तो शून्य से टकराकर लौट आती है।

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सर्द रात

एक सर्द रात, एक स्त्री अपने कमरे के कोने में अकेले आंसू बहा रही थी। पति को परमेश्वर मानकर वह सालों तक जुल्म सहती रही। आज, उनके ना रहने के बाद भी वह उस रात की याद से अपने आप को कंपकंपा महसूस करती है।

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सहनशीलता का अभाव और टूटते रिश्ते

हर इंसान अलग है सोच में, सहने की क्षमता में और जीने के तरीके में। लेकिन जब हम इस भिन्नता को स्वीकार करने के बजाय एक-दूसरे की खामियाँ गिनने लगते हैं, तभी रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। सहनशीलता और संवाद के बिना परिवार साथ रहते हुए भी बिखरने लगते हैं।

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अब बात नहीं करोगे…

उस दिन उसने कहा-“अब बात नहीं करोगे।”
शब्द ठंडे थे, पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। मैं मुस्कुरा दी और कह दिया-“मैं भी बात नहीं करूँगी।”
वास्तव में, हमने पहले ही बातचीत खो दी थी। मैं हर रोज़ उसके पास बैठकर कुछ पल चाहती थी. बस सुनना, समझना, साथ में रहना। लेकिन वह हमेशा जवाब देता रहा, पर कभी वास्तव में मौजूद नहीं था। महँगे तोहफ़े, बड़े रेस्टोरेंट, दिखावटी सुख, कुछ भी मेरे भीतर के खालीपन को भर नहीं सका।

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तुम और तुम्हारी यादें…

उस स्त्री की पीड़ा जो भुलाने की हर कोशिश के बावजूद स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पाती। वादों से भरे प्रेम का अचानक टूट जाना, चुपचाप सहा गया अत्याचार और अकेलेपन में बहते आँसू—सब मिलकर एक ऐसी कहानी रचते हैं जहाँ प्रेम भले ही दूर हो जाए, पर उसकी यादें भीतर ज़िंदा रहती हैं। दूरी के बावजूद दो आत्माएँ एक-दूसरे की प्रतीक्षा में बँधी रहती हैं, जैसे एक ही परिंदे के दो पंख।

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पहले झगड़े थे, आज दूरी

हर इंसान अलग है उसकी सोच, सहने की क्षमता, बोलने का तरीका और चुप्पी की भाषा भी अलग होती है। फिर भी हम एक-दूसरे में खामियाँ खोजने लगते हैं और यही खामियाँ धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी बना देती हैं। आज परिवार छोटे हो गए हैं, लेकिन दिलों के फासले बढ़ गए हैं। जहाँ पहले प्रेम और सम्मान झगड़ों पर भारी पड़ते थे, आज अहंकार और असहिष्णुता रिश्तों को तोड़ रही है। साथ रहते हुए भी अकेले हो जाना, शायद हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।

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एक कतरा प्यार

वह मुझसे नहीं, मेरे वजूद के सिर्फ एक छोटे से अंश से प्यार कर बैठा। उसे शायद अंदाज़ा भी नहीं कि मेरे बाकी हिस्सों में कितनी कहानियाँ, कितने घाव और कितनी चुप्पियाँ दबी पड़ी हैं। मेरी हँसी के पीछे छुपे आँसू, मेरे सुकून के पीछे की बेचैनी, और मेरी तन्हाइयों के पीछे की चीखें ये सब उसकी समझ से बहुत दूर हैं।

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स्वार्थ…

टूटते और जुड़ते दिल की आदत, बार-बार धोखे और छल का सामना करना, और अंततः यह समझ कि दुनिया में प्यार और वफ़ा केवल स्वार्थ के पीछे छुपे होते हैं यही इस अनुभव की सार्थकता है। पाठ में व्यक्तिगत पीड़ा और जीवन की कठोर सच्चाइयाँ एक साथ बुनी गई हैं,

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अजब दौर है…

नमिता गुप्ता, लखनऊ (उ.प्र) ” सरल बेटा, क्या हाल है तुम्हारा।”मैं ठीक हूँ दादाजी । अभी मै कालेज में हूँ। टेक केयर दादा जी… मैं फोन रखता हूँ।”विजय ने अपने मित्र को फोन मिलाया “हेलो!! गगन तू कैसा है ?”“यार ,मैं ठीक हूँ, तू अपनी बता।”” क्पा बताऊ यार,बुढ़ापे में जोड़ों में दर्द रहता है।…

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