शताब्दी वर्ष पर मोहन राकेश को याद किया ‘बतरस’ ने॰॰॰

मुंबई के केशव गोरे ट्रस्ट सभागार में सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ के 27वें मासिक आयोजन में साहित्यकार मोहन राकेश की रचनात्मक विरासत पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य और नाटक का सशक्त स्तंभ बताते हुए कहा कि उनका साहित्य आज भी सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं के कारण प्रासंगिक है। कार्यक्रम में उनके नाटकों और कहानियों के अंशों की प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ हुईं और समापन राष्ट्रगीत के साथ किया गया।

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वरिष्ठ बाल साहित्यकार नीलम राकेश होंगी सम्मानित

बाल साहित्य के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय और सशक्त रचनात्मक योगदान देने वाली वरिष्ठ बाल साहित्यकार श्रीमती नीलम राकेश को वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित ‘अखिल भारतीय अनुराग साहित्य सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान अनुराग सेवा संस्थान, लालसोट (राजस्थान) की ओर से प्रदान किया जा रहा है।

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“मन की देहरी: संवेदनाओं का प्रवेशद्वार”

“‘मन की देहरी’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो पाठक को भीतर तक छू जाता है। पूनम सिंह जी की सरल और भावपूर्ण कविताएँ प्रेम, स्मृति और स्त्री-मन की गहराई को उजागर करती हैं। प्रत्येक पंक्ति जैसे पाठक के अपने अनुभवों का प्रतिबिंब है। एक पुस्तक जो संवेदनाओं और आत्मिक प्रेम का संसार खोलती है।”

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शब्दों में संवेदना का दरवाज़ा :”मुझ में भी रहता है इकतारा”

डॉ. तारा गुप्ता द्वारा लिखित गज़ल संग्रह मुझ में भी रहता है इकतारा दिल और दिमाग के बीच बहते उस पुल की तरह है, जिस पर चलते हुए पाठक जीवन, संवेदना, अनुभव और दर्शन सभी को साथ लेकर आगे बढ़ता है. कुल 70 ग़ज़लें, 36 मुक्तक और 35 दोहे इस संग्रह को विविधता से भरते हैं और पाठक को एकरसता से दूर रखते हैं.

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कृष्ण तुम ही हो…

कवि कृष्ण को सबमें और सब कुछ कृष्ण में देखता है। वे ज्ञान भी हैं और विज्ञान भी, वेद भी हैं और उपदेश भी। प्रकृति में बहती सरिता से लेकर सागर की गहराइयों तक, पेड़-पौधों की हरियाली से लेकर धरती की मुस्कान तक हर रूप में कृष्ण विराजते हैं। वे काल भी हैं और भाव भी, प्रेम की ज्वाला भी और विरह की पीड़ा भी। कभी मरहम बनकर सहलाते हैं तो कभी प्रेरणा बनकर दिशा दिखाते हैं। भजन-किर्तन में गूंजते स्वर हों या संसार की माया सब कृष्ण ही हैं, तारणहार भी वही।

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महिला काव्य मंच की मासिक काव्य गोष्ठी सम्पन्न

महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई द्वारा 14 नवम्बर 2025 को ऑनलाइन मासिक काव्य गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया. कार्यक्रम बाल दिवस के उपलक्ष्य में समर्पित रहा, जिसमें बचपन, मासूमियत, संस्कार, स्मृतियों और जीवन मूल्यों पर आधारित अनेक भावपूर्ण व विविध विधाओं की रचनाएँ प्रस्तुत की गईं. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. ऊषा चौधरी, अध्यक्ष उत्तर प्रदेश मध्य (मकाम) तथा विशिष्ट अतिथि नोरिन शर्मा, सचिव पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मकाम) रहीं. गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. राजेश कुमारी (राष्ट्रीय अध्यक्षशिक्षा मंच एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मकाम ने की.

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सन्नाटे में चीख 

इमारत के छोटे से फ़्लैट में रहने वाले सक्सेना दंपती की ज़िंदगी एक-दूसरे के इर्द-गिर्द सिमटी थी। लेकिन एक सुबह अचानक आई आंटी की मौत ने सब कुछ बदल दिया। लकवे से ग्रस्त अंकल अपनी आँखों के सामने सब कुछ होते हुए देख भी कुछ नहीं कर पाए। यह हृदयविदारक घटना अकेले रह रहे बुज़ुर्गों की असहायता और समाज की अनदेखी पर गहरे सवाल खड़े करती है।

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तेरी बिंदिया रे…..

जहां शायरों ने, कवियों ने, औरत की सुंदरता के लिए अनेकों उपमानों का प्रयोग किया है, जैसे झील सी गहरी आंखें, हिरण सी सुंदर आंखें, सुराही दार गर्दन, मोरनी सी चाल, वहीं एक प्रेमी, अपनी प्रेमिका की बिंदी पर मर मिटा है,और वह चाहता है कि चाहे वह और कोई श्रृंगार करें या ना करें ,सिर्फ एक छोटी सी बिंदी वह अपने माथे पर लगा ले, और उसे किसी भी उपमान की जरूरत नहीं होगी।

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धैर्य का प्रतिफल

यह कविता धैर्य और perseverance का संदेश देती है। जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, समय, लगन और सही प्रयास से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। कवि ने साधारण उदाहरणों — पक्षियों का धीरे-धीरे नीड़ बनाना, पर्वत चढ़ाई, अर्जुन की वीरता — के माध्यम से समझाया है कि धैर्य एक ऐसा गुण है, जो अंततः सफलता और फल की प्राप्ति कराता है। यह कविता आत्म-प्रेरणा और मानसिक दृढ़ता की भावना को गहरे रूप में उजागर करती है।

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आधे गीत , अधूरा जीवन

यह कविता कृष्ण और राधा के अधूरे मिलन और आधे गीत की पीड़ा को व्यक्त करती है। कवि अपने मन में बंसी की तान सुनते हुए राधा जैसा जीवन जीने की चाहत व्यक्त करता है। अधूरी आकांक्षाएँ, जंजीरों को तोड़कर आज़ादी पाने की तड़प, और पुनर्जन्म में फिर से कृष्ण को देखने की प्रार्थना कविता के भावों को गहरा और मार्मिक बनाती है। यह कविता प्रेम, विरह और आधे जीवन की अधूरी तृप्ति को दर्शाती है।

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