सौ सुनार की, एक लोहार की
सौ सुनार की, एक लोहार की!” एक प्रेरणादायक लघुकथा है, जिसमें एक माँ अपनी बेटी के सपनों के साथ खड़ी होती है और बेटी अपनी मेहनत से समाज की सोच को करारा जवाब देती है।

सौ सुनार की, एक लोहार की!” एक प्रेरणादायक लघुकथा है, जिसमें एक माँ अपनी बेटी के सपनों के साथ खड़ी होती है और बेटी अपनी मेहनत से समाज की सोच को करारा जवाब देती है।
कलयुग में विवाह और रिश्तों के बदलते अर्थ को उजागर करती यह कविता विश्वास, वासना और टूटते संस्कारों पर तीखा प्रश्न खड़ा करती है।
हिंदी भाषा के सम्मान और राष्ट्रभाषा के स्वर को सशक्त रूप में प्रस्तुत करती यह कविता भारत की सांस्कृतिक एकता और भाषाई गौरव का संदेश देती है।
लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि आत्मा का संवाद है। लिखिए क्योंकि शब्द सुकून देते हैं, सपनों को पहचान देते हैं और आपको आपकी कहानी का रचनाकार बनाते हैं।
मोबाइल आज ज्ञान, संचार और सुविधा का माध्यम है, लेकिन अंधाधुंध उपयोग ने रिश्तों, बचपन और मूल्यों को संकट में डाल दिया है। चन्द्रवती दीक्षित की यह कविता तकनीक और विवेक के बीच
संतुलन की ज़रूरत को गहराई से उजागर करती है।
विश्व हिंदी दिवस 2026 के अवसर पर हैदराबाद में आयोजित त्रिभाषा अधिवेशन एवं कवि सम्मेलन में नागपुर की साहित्यकार मेघा अग्रवाल को साहित्य सम्मान प्रदान किया गया। उनके सशक्त काव्यपाठ को श्रोताओं ने खूब सराहा।
नागपुर की प्रतिष्ठित कवयित्री मेघा मनोज अग्रवाल को समाजसेवा, हिंदी लेखन और उनकी बहुमुखी प्रतिभा के लिए राज्यस्तरीय नारी रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान श्याम बहुउद्देशीय विकास संस्था की ओर से देवरी में आयोजित भव्य समारोह में संस्था के संस्थापक डॉ. घनश्याम निखाड़े द्वारा प्रदान किया गया। इस उपलब्धि से नागपुर का नाम गौरवान्वित हुआ है।
ठंडी हवा ने जैसे पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया था. सुबह की धुंध गलियों में चुपचाप उतर आई थी और सूरज की किरणें मानो रास्ता तलाश रही थीं. लोग शॉल और स्वेटर में सिमटे, कदम धीरे-धीरे बढ़ा रहे थे. हर मोड़ पर चाय की भाप उठती दिखती थी, जो ठिठुरते बदन को थोड़ी राहत देती थी. कहीं बुजुर्ग आग के पास हाथ सेंकते नजर आते, तो कहीं बच्चे ठंड से सिकुड़ते हुए भी स्कूल की राह पकड़ते थे. यह सर्दी केवल मौसम नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चाल को थाम लेने वाली एक खामोश ताकत बन चुकी थी.
तुम्हारी लिखी हर पंक्ति ने मुझे भीतर तक छू लिया। तुम्हारे शब्दों में गंभीरता और स्त्री‑सम्मान की झलक थी। धीरे‑धीरे तुम्हारा व्यक्तित्व मेरे मन में उतर गया, और अब मुझे लगता है कि मैं तुम्हारी लेखनी की प्रेयसी बन चुकी हूँ। हर रोज़ तुम्हारा लिखा पढ़ना, मेरे लिए एक नयी दुनिया की खोज और प्रेम का अनुभव है।
विनोद कुमार शुक्ल भले ही देह से विदा हो गए हों, पर उनकी लेखनी आज भी साँस लेती है। उनके शब्दों की मंत्रमुग्धता पाठक को यह एहसास कराती है कि सच्चा साहित्य कभी समाप्त नहीं होता, वह चेतना में जीवित रहता है।