मुखरित संवेदनाएँ
एक वास्तुविद् घर का निरीक्षण करने आता है, लेकिन परिवार के आपसी प्रेम, सम्मान और सामंजस्य को देखकर उसे एहसास होता है कि ऐसे घर में किसी वास्तुदोष की गुंजाइश ही नहीं।

एक वास्तुविद् घर का निरीक्षण करने आता है, लेकिन परिवार के आपसी प्रेम, सम्मान और सामंजस्य को देखकर उसे एहसास होता है कि ऐसे घर में किसी वास्तुदोष की गुंजाइश ही नहीं।
पोते रवि के लौटने से श्याम बाबू की सूनी जिंदगी में खुशियाँ लौट आती हैं, लेकिन पुराने घर की दीवारें उन्हें उस बेटे मोहन की याद दिलाती हैं, जिसका आज भी इंतजार है।
दादू की आँखों में वर्षों से पल रहे इंतज़ार को जब पोता समझता है, तो रिश्तों, मिट्टी और अपनी जड़ों से जुड़ने की एक भावुक कहानी सामने आती है.
सान्वी ने अपने दिल के चारों ओर दीवार खड़ी कर ली थी, लेकिन विहान के भरोसे ने उसे फिर से रिश्ते पर विश्वास करना सिखाया. जब वही भरोसा और उम्मीदें टूटने लगीं, तो उसे एहसास हुआ कि उम्मीदों का दर्द दिल टूटने से कहीं गहरा होता है.
बरसों से सूना पड़ा पुश्तैनी घर आज भी अपने लोगों की आहट का इंतज़ार कर रहा है। रवि जब लौटता है, तो दीवारें, चूल्हा, गुलमोहर और आँगन की तुलसी उसे बीते रिश्तों और यादों की कहानी सुनाते हैं।
एक सुनसान और बरसों से बंद घर में लौटे व्यक्ति को खामोश दीवारों, पुरानी तस्वीरों और सीलन के बीच बीते जीवन की अनकही कहानियाँ सुनाई देने लगती हैं।
अंजलि दिल्ली लौटते समय सब्जियाँ खरीदती है. छुट्टे पैसे न होने पर जब वह सामान लौटाने लगती है, सब्जी वाली अम्मा का सहज जवाब ‘पेटीएम है’ कहानी को एक दिलचस्प मोड़ देता है.
एक छोटी बच्ची की फैंसी ड्रेस ठीक कराने के लिए माँ पुराने दर्जी शेरा भाई के पास पहुँचती है. एक पुरानी पोशाक में लगी सुनहरी किनारी सिर्फ ड्रेस नहीं सँवारती, बल्कि माँ की सोच को भी एक नई दिशा देती है.