हिंदी कविता
तुम दूर हो या क़रीब ?
जब संवाद थम जाता है और इंतज़ार लंबा हो जाता है, तब प्रेम अपने भीतर सवालों की शक्ल लेने लगता है। यह रचना उसी असमंजस को स्वर देती है, जहाँ नज़दीकियाँ इतनी गहरी रही हैं कि दूरी का अर्थ समझ में ही नहीं आता। प्रेम में किया गया भरोसा, व्यस्तताओं के बीच पनपती बेचैनी और यह डर कि कहीं अपना व्यक्ति धीरे-धीरे दूर तो नहीं हो रहा इन्हीं भावों के बीच यह कविता पाठक को रिश्तों की सबसे कोमल और सच्ची अनुभूति से जोड़ती है।
कुछ रंग ऐसे भी…
यह कविता जीवन के उस कैनवास की कथा है, जहाँ धोखे और बनावटी रंग इतने फैल जाते हैं कि प्रेम, अपनेपन और आत्मा के रंग खो से जाते हैं, और बचती है केवल ख़ामोश उदासी।
शाश्वत कर्म
“शाश्वत कर्म” एक आध्यात्मिक कविता है, जो श्रीकृष्ण भक्ति, कर्मयोग और मानव जीवन के शाश्वत सत्य को सरल और भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है।
चलता चल राही
चलता चल राही” एक प्रेरणादायक कविता है, जो बताती है कि जीवन की राह में कांटे, बाधाएँ और संघर्ष आएँगे, लेकिन रुकना नहीं बस चलते रहना ही विजय का मार्ग है।
ख़ामोश प्रेम-पत्र
शब्दों से परे प्रेम की एक कोमल अनुभूति “ख़ामोश प्रेम-पत्र” उस भावना को बयान करती है, जहाँ लिखना नहीं, महसूस करना ही प्रेम है।
हम सपने देख रहे हैं….
“हम सपने देख रहे हैं” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो स्त्री के जीवन, त्याग, श्रम, घरेलू और सामाजिक संघर्ष को रोटी के प्रतीक के माध्यम से गहराई से अभिव्यक्त करती है।
बदलता वक़्त…
“बदलता वक़्त” एक मार्मिक हिंदी कविता है, जो टूटते रिश्तों, बढ़ती हैवानियत, अख़बारी सुर्खियों की लाल स्याही और समाज में गिरती इंसानियत को संवेदनशील शब्दों में उजागर करती है।
मछलियाँ…
इन आँखों में बसे असंख्य समंदर कभी हँसी बनकर छलकते हैं, तो कभी अचानक आँसुओं में बदल जाते हैं। जाल से डरती मछलियाँ अतल गहराइयों में खो जाती हैं, जहाँ बिछुड़ने का दुख भी उनके हिस्से आता है। बाज़ार की साज़िशों में उलझा शिकारी सिर्फ़ पकड़ने की भाषा समझता है उसे न जिजीविषा दिखती है, न जीवन की पीड़ा। रंग-बिरंगी मछलियाँ कुछ दिनों का मनोरंजन बनती हैं और फिर गंदे पानी में तड़पकर समर्पित हो जाती हैं। स्वच्छ पानी की अनदेखी में दम तोड़ती मछलियाँ याद दिलाती हैं कि जीवन तभी बचेगा, जब संवेदना बचेगी।
ऋतु बसंत आयो री…
“ऋतु बसंत आयो री” प्रकृति के नवजीवन, प्रेम और उल्लास का काव्यात्मक उत्सव है। शीतल बयार, खिले सुमन, कोयल की कूक और मन के हिलोर के माध्यम से यह कविता बसंत ऋतु की जीवंत अनुभूति कराती है।
