चलो छोड़ो भी…
हर अपना हमेशा अपना नहीं रहता और हर सफर मंज़िल तक नहीं पहुँचता। ‘चलो छोड़ो भी…’ कविता टूटते भरोसे, बदलते रिश्तों और जीवन में समय के साथ आगे बढ़ने की बात कहती है।

हर अपना हमेशा अपना नहीं रहता और हर सफर मंज़िल तक नहीं पहुँचता। ‘चलो छोड़ो भी…’ कविता टूटते भरोसे, बदलते रिश्तों और जीवन में समय के साथ आगे बढ़ने की बात कहती है।
कभी कोई लौटकर सिर्फ एक बार मुड़कर देख ले, तो बरसों की रंजिशें मिट सकती हैं। यह कविता प्रेम, इंतज़ार, विरह और बीते पलों की उन यादों को स्वर देती है, जो आज भी दिल में जीवित हैं।
कुछ राखियों को लिफाफे नहीं मिले और कुछ लिफाफों को राखियाँ. कुछ पर पते ही नहीं थे. यह कविता उन राखियों की कहानी है, जो कभी अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच सकीं और अब रक्षा के बंधन से मुक्त हो चुकी हैं.
जीवन की भागदौड़ में कुछ रिश्ते पीछे छूट जाते हैं, लेकिन उनकी यादें हमारे भीतर कहीं ठहर जाती हैं. यह कविता उन्हीं शांत पलों की कहानी है, जब आसमान, सितारे और शाम की खुशबू किसी अपने की याद दिला जाती है.
कुछ रिश्ते भले ही जीवन से चले जाएँ, लेकिन उनकी यादें हमेशा साथ रहती हैं। यह कविता बिछड़ने के बाद भी दिल में बसे प्रेम, अधूरी मुलाकातों, बारिश की स्मृतियों और अनकहे एहसासों को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।
यह कविता सिर्फ़ शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि मेरे अपने जीवन के एक बेहद खूबसूरत सच का हिस्सा है। मेरी ज़िंदगी के हर उतार-चढ़ाव में, मेरी हर छोटी-बड़ी कामयाबी में और ख़ासकर मेरे सबसे कठिन समय में, मेरे सच्चे दोस्त ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया है। इस निस्वार्थ परवाह और साथ के लिए शब्दों में शुक्रिया कहना मुमकिन नहीं, पर यह कविता मेरे उसी अज़ीज़ दोस्त को एक छोटा-सा समर्पण है।
एक शहीद सैनिक की बेटी की दृष्टि से लिखी गई यह हृदयस्पर्शी कविता पिता के बलिदान, माँ के दुःख और एक बेटी के अधूरे स्नेह की कहानी कहती है। “मैं पापा की नन्ही परी” पाठकों की संवेदनाओं को गहराई से छू लेने वाली रचना है।