Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

जिंदगी कुछ इस तरह…

एक समय था जब मेरी पसंद की एक शाम हुआ करती थी — चाय की प्याली, साथ में वो दो होंठ, और मेरे दिल के सबसे करीब वो शहर। अब सब कुछ छूट चुका है। मेरी क्यारी का गुलाब, मेरे गाल का गुलाल, मेरी आँखों का काजल, यहाँ तक कि मेरे होठों की तपिश और जिस्म पर चुम्बन की कल्पना तक — कोई और ले गया। दो जिस्म एक धड़कन बनकर जिसे मैं अपना मान बैठा था, वो अब किसी और के दिल में बस गया। मेरे हर अज़ीज़ को रक़ीब अपने नाम कर गया।

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“कभी तो आओ… फुर्सत के इतवार बनकर”

यह कविता एक गहरी प्रतीक्षा की पुकार है—जहाँ मन किसी के आगमन की राह देख रहा है, जो कभी फुर्सत, कभी मल्हार, कभी रंग और कभी आसुओं की धार बनकर आए। भावनाओं से सजी ये पंक्तियाँ एक ऐसी उपस्थिति की चाहत हैं, जो जीवन को फिर से स्पर्श करे, संगीतमय बनाए और रंगों से भर दे।

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मन की आवाज़ और मुसाफ़िर दिल…

दूरी, अनिश्चितता और आत्मसंघर्ष से भरे इन भावों में एक अकेली रूह की पुकार है – जो कभी अपने प्रिय को पुकारती है, कभी जीवन की राहों से सवाल करती है, तो कभी अंधेरों में खुद को एक जुगनू की तरह जलता हुआ महसूस करती है। ये पंक्तियाँ उस मन की आवाज़ हैं जो भटकते हुए भी उम्मीद नहीं छोड़ता।

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वे पुरानी सी प्रेमिकाएं…

यह कविता उन पुरानी प्रेमिकाओं और पत्नियों को समर्पित है जिन्हें पढ़ना-लिखना भले न आता हो, पर जिन्होंने प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियाँ रचीं — कभी गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से प्रेम-पत्र उकेरकर, तो कभी पलकों के इशारे से मन की बात कहकर। उनका प्रेम किताबों में नहीं, ज़मीन पर लिखा जाता था। आज की चिकनी टाइल्स और मार्बल की ज़मीन पर वो प्रेम-पत्र कहीं दबकर खो चुके हैं। इस निश्छल, मौन, पर गहरे प्रेम को समझने के लिए शायद हमें टाइम मशीन में लौटकर जाना होगा।

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