बारह मासा 

“चैत्र की चपलता और बैसाख की तपिश से लेकर सावन की झूलों वाली हरियाली और भादो के घने बादलों तक, यह काव्य भारतीय मासों का रंगीन चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें ऋतुओं के बदलते रंग, प्रकृति का सौंदर्य और ग्रामीण जीवन की सहज लय एक साथ बुनी गई है, जो पाठक को पूरे वर्ष के मौसम सफर पर ले जाती है।”

Read More
पुश्तैनी घर के बाहर खड़ी संघर्षशील भारतीय महिला, पारिवारिक बंटवारे के बाद भावुक दृश्य।

तिनके

छिन चुकी थीं एक छत, जो बँटवारे की भेंट चढ़ गई थी और मजबूरी में बेचनी पड़ी थी।
वैसे तो सविता को ज़मीन-जायदाद से कोई मोह नहीं था, लेकिन एक रहने को घर तो चाहिए ही था — जो अपना होता। पर जमीनी लालची अपनों ने ही उसका घर छीन लिया था। कानूनी दांव-पेंच में सविता को अपनी पतंग काटने में बरसों लग गए।
जीवन बिखरे तिनकों को समेटने में बीत रहा था। ख्वाहिशों की आग भी अब मध्यम हो चुकी थी।

Read More
मैं एक दीवार हूँ: मौन सहारा, दर्द और इतिहास की संवेदनशील कविता

ऐतिहासिक दीवार

मैं एक पुरानी दीवार हूँ बोलने में असमर्थ, फिर भी सबके दुःख-दर्द, गुस्से और उपेक्षा की साक्षी| लोग अपने विषाद, हँसी, और थकान को मुझ पर टांग जाते हैं जैसे कोई पोस्टर दीवार पर चिपकाता है| जब वे मेरी पीठ से सिर टिकाकर बैठते हैं, मैं उन्हें मौन सहारा देती हूँ्| फिर भी, बदले में मुझे गालियॉं और अपमान मिलता है जैसे कोई पान की पीक थूक देता हो| मैं पुरानी जरूर हूँ, टूटने की कगार पर भी, लेकिन मेरे भीतर इतिहास छिपा है मैं ऐतिहासिक हूँ्

Read More

श्याम रंग में भीग चला मन

इस कविता में रचनाकार भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम और आध्यात्मिक लगाव को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से व्यक्त करता है। वह पाठक को कृष्ण के धाम की ओर जाने का निमंत्रण देता है — उस पावन भूमि की ओर, जहाँ संध्या होते ही गोपियाँ नृत्य करती हैं और हर दिशा भक्ति-रस में भीग जाती है। श्रीकृष्ण की एक झलक पाकर ऐसा अनुभव होता है मानो मृत्यु भी अब भयावह नहीं, बल्कि सुखद और शांति देने वाली हो गई हो। यह भाव उस आत्मिक स्थिति का संकेत है जहाँ ईश्वर-दर्शन के बाद जीवन-मरण का बंधन अर्थहीन प्रतीत होने लगता है। रचनाकार के लिए कृष्ण केवल एक देवता नहीं, बल्कि प्रेम और सत्य के प्रतीक हैं। उनके भीतर एक ईश्वरीय आभा और तेज है, जो उन्हें औरों से अलग बनाता है, यहाँ तक कि राम से भी। यह तुलना विरोध नहीं, बल्कि भावों की भिन्नता को दर्शाती है — राम मर्यादा के प्रतिनिधि हैं, तो कृष्ण प्रेम के।

Read More

आओ चाय बनाए …

“आओ चाय बनाए” एक भावनात्मक आमंत्रण है, जिसमें चाय बनाने की प्रक्रिया को एक प्रेमपूर्ण और सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह कविता सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि आत्मीयता, मिलन और घरेलू सौंदर्य की प्रतीक है। मसालों की सुगंध, शक्कर की मिठास और चाय की पत्ती की उबाल के साथ मित्रता और अपनापन भी घुलता है। यह कविता हर उस व्यक्ति को बुलाती है जो रिश्तों की गर्माहट को महसूस करना चाहता है — एक प्याले चाय के साथ।

Read More

बूँदों की पदचाप…

मैं ध्यानमग्न होकर आज वर्षा की बूँदों की पदचाप सुन रही हूँ। ये बूँदें जैसे कोई देववधू बनकर घूँघट काढ़े आई हों और धरती से मधुर आलिंगन कर उसका संताप हर रही हों। मिट्टी में मिलकर अंकुरित होने लगीं, मानो जीवन की नई कोंपलें फूटने लगी हों। पूरी प्रकृति जैसे किसी रचनात्मक क्रीड़ा में सम्मिलित हो गई हो। इन बूँदों ने तन-मन को धोकर शुद्ध कर दिया, और भीतर की Maya को खोज निकाला। प्रत्येक बूँद अब एक मोती बन गई है, जिसे मन सहेज रहा है, मानो किसी गूढ़ तत्व से मिलने का जाप हो रहा हो।

Read More

रेत से ख़्वाब आँखों में आफ़ताब

ज़िंदगी हर रोज़ रेत-सी थोड़ी-थोड़ी फिसलती जाती है, और आँखों में ख्वाब आफ़ताब की तरह जलते हैं। कामयाबियों की चर्चा तो सब करते हैं, मगर नाकामियों से जब सामना हुआ था, उसका भी कभी हिसाब देना पड़ेगा। समाज की यही रीत है कि वह चैन से जीने नहीं देता और अनचाहे सवालों के जवाब मांगता है। दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाने वालों को पहले अपनी करतूतों की किताब खोलकर देखनी चाहिए। फकीर फकीर ही रहा, क्योंकि उसने चापलूसी नहीं की – वहीं नवाब बनते गए जो मीठी बातों में उलझे रहे। लेकिन जिसने सच कहा, वो हमेशा गलत समझा गया। फिर भी, अपने विश्वास की चाल न टूटी है, न टूटेगी।

Read More

शब्द मेरे भाव मेरे

निरुपमा सिंह, बिजनौर उमड़ते भावों कोशब्दों में उकेरनान जाने यह शौक !कब और कैसे पनप गयानन्हा पौधा था जोअब वृक्ष बन गयाकुछ तो बचपन से ही थाप्रकृति का सान्निध्य मिलास्वयं ही हरा-भरा हो गयापानी के स्पर्श मात्र से हीखूब फल-फूल गयाउर्वरा के सान्निध्य मेंदोगुना हो गयामानों इच्छाओं कोखुला आकाश मिल गया। Post Views: 372

Read More

यदि प्रेम में होते बुद्ध…

अगर बुद्ध प्रेम में होते, तो शायद वे किसी वृक्ष की छाया के बजाय किसी प्रिय की मुस्कान को ध्यानस्थ होने का स्थान चुनते। उनके उत्तर तब भी मौन होते, लेकिन उस मौन में प्रेम की एक गहरी समझ समाई होती। वे प्रेमिका की आँखों में जीवन का अर्थ खोजते, जैसे निर्वाण की झलक किसी मानस में देख रहे हों। वे प्रेम को उसी तरह थामते जैसे उन्होंने उस कटोरे को थामा था जिसमें संसार का सारा दुःख समाया था—बिना अपेक्षा, बिना आहट। उनका प्रेम निःस्वार्थ और निर्लिप्त होता, जैसे संन्यास लिया हो—पूरी तरह समर्पित, फिर भी पूर्ण स्वतंत्र। न उसमें मोह होता, न विरक्ति—सिर्फ सहज स्वीकृति। प्रेम, उनके लिए, कोई उन्माद नहीं बल्कि एक शांत, स्थिर जलधारा होता, जो “मैं” और “तू” के पार ले जाती। तब शायद हम भी समझ पाते कि प्रेम भी एक मार्ग है—मोक्ष की ओर, जहाँ खोना ही पाना है, और समर्पण ही सबसे बड़ा बोध।

Read More