
सुप्रसन्ना
राखी की ये रेशमी डोरी,
संग लाती प्यार की लोरी।
माथे पर टीका, मिठाई की थाली,
सजी है बहन की आँखों में खुशहाली।
आशीर्वाद की मीठी फुहार में,
महक उठे हर रिश्ते की डाली।
राखी का त्योहार भारतीय संस्कृति की आत्मा में रचा-बसा ऐसा पर्व है, जो न केवल भाई-बहन के रिश्ते को, बल्कि पूरे परिवार के आपसी प्रेम और अपनत्व को भी उजागर करता है। यह एक ऐसा अवसर है, जब बचपन की मासूमियत, हँसी-ठिठोली और अनगिनत स्मृतियाँ फिर से जीवंत हो उठती हैं।
जब बहन अपने नन्हे हाथों से राखी बनाती या खरीदती है, तो उसमें केवल रंग-बिरंगे धागे नहीं होते, बल्कि हर धागे में उसकी भावनाएँ गुँथी होती हैं। वह राखी के माध्यम से अपने स्नेह और भाई के लिए अटूट दुआओं को पिरो देती है। भाई की कलाई पर राखी बाँधते समय उसकी आँखों में स्नेह और चेहरे पर मुस्कान, दोनों ही इस रिश्ते की गहराई को दर्शाते हैं।
इस त्योहार की सुंदरता केवल रस्मों में नहीं, बल्कि उन अनकहे जज़्बातों में छिपी है, जो भाई-बहन के दिल से निकलकर उनकी जिंदगी में घुल जाते हैं। राखी वह पल है, जब भाई-बहन की नोंक-झोंक और मिठाई के एक छोटे-से टुकड़े में पूरी दुनिया की मिठास समा जाती है।
बचपन में बहन जब भाई से गुड़िया की शादी करवाने के लिए ज़िद करती थी, उसके लिए खिलौने माँगती थी, या भाई जब बहन की किताबें छिपाकर उसे परेशान करता था—उन सारी शरारतों की मिठास राखी के दिन और गहरी हो जाती है। समय चाहे कितना भी बदल जाए, भाई-बहन के इस रिश्ते की मासूमियत कभी कम नहीं होती।
राखी का त्योहार हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में रिश्तों की असली पूँजी भावनाएँ होती हैं। यह पर्व प्रेम, समर्पण, त्याग और विश्वास का उत्सव है। यह हमें याद दिलाता है कि सच्चे रिश्तों को समय, दूरी या परिस्थितियाँ कभी कमजोर नहीं कर सकतीं।
राखी के इस अवसर पर हर भाई-बहन के रिश्ते में और भी गहराई, मिठास और उजास आए—यही कामना है।
