Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

“जहां से मैं शुरू हुई, वहां मैं नहीं रुकी”

प्रभा ने जीवन भर त्याग और समर्पण सीखा, लेकिन जब अपनी बेटी की बातों ने उसे आईना दिखाया, तो उसने खुद के अस्तित्व की तलाश शुरू की। आज, वह सिर्फ किसी की पत्नी या बहू नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, एक मार्गदर्शक और एक सफल स्त्री है — अपनी पहचान के साथ।”

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गांव में क्या रखा है…

लोग कहते हैं, “गांव में क्या रखा है?”
पर मेरे लिए गांव सिर्फ एक जगह नहीं, मेरे बचपन की थाती है।

वहीं दादी की कहानियां थीं, मां के हाथों से खाया निवाला था, नीम की ठंडी छांव, खेतों की हरियाली और चौपाल की गर्मजोशी थी। कुएं का पानी, पगडंडियों की धूल और पुराने बक्सों में बंद वो मासूम दिन – सब वहीं छूट गए हैं।
गांव की मिट्टी में सिर्फ धूल नहीं, मेरी जड़ें हैं।
जो कहते हैं “गांव में कुछ नहीं रखा,”
शायद उन्होंने कभी गांव को जिया ही नहीं।

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मुंबई में आयोजित हुआ ‘केवल काव्य परिवार’ का भव्य काव्य संध्या समारोह

चेन्नई से पधारे कवि-उद्योगपति केवल कोठारी के सम्मान में हुआ आयोजन नवी मुंबई, 14 जून साहित्यिक प्रेमियों के लिए शनिवार की शाम खास रही, जब सेक्टर-21, खारघर में आयोजित हुई एक भावपूर्ण और भव्य काव्य संध्या। यह आयोजन “केवल काव्य परिवार” के संस्थापक, चेन्नई से पधारे उद्योगपति व कवि श्री केवल कोठारी के मुंबई आगमन…

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भय

“अब का भूल जाओ सब और अपनी छोटी बेटी पर ध्यान दो” — कहकर मातादीन छोटे ठाकुर की गाड़ी चलाने चला गया। राधा की मौत से टूटा, मगर डर से बंधा बाप अपने आंसू निगल गया। ये सिर्फ़ एक बेटी की कहानी नहीं, पूरे सिस्टम की चुप्पी की चीख़ है, जहां ज़िंदगी से ज्यादा बड़ी होती है रोटी की मजबूरी और डर।

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कैक्टस

वो कभी तन्हा न लगता है, गमले में भी कितना ख़ुश रहता है… कैक्टस की तरह जो जीवन की हर सख़्ती में भी मुस्कुराता है। न धूप की शिकायत, न छाँव की उम्मीद—बस अपनी मौजूदगी में जीता हुआ एक प्रतीक उम्मीद का।

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गांव के आंगन में एक लड़की चाय का कप पकड़े, सामने भावुक खड़ा एक युवक, हल्की धूप और भावनात्मक माहौल

अधूरी चाय, अधूरा इश्क़

चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।

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बूंदों के नूपुर

अम्बर चमके दामिनी, रिमझिम पड़े फुहार, सोंधी माटी की महक से भीगता देहात, सावन की झूले झूलती सखियाँ, बादलों संग गूंजता बूंदों का संगीत — यह कविता मानसून के सौंदर्य, ग्रामीण जीवन के उल्लास और प्रकृति की रूमानी छवि को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।

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परदों के रंग से बदलें घर का भाग्य

वास्तु शास्त्र में जैसे दिशाओं का महत्व है, वैसे ही रंगों की भी विशेष भूमिका होती है. हमारे घर की बनावट, साज-सज्जा और रंग संयोजन सिर्फ सुंदरता ही नहीं बढ़ाते, बल्कि हमारे जीवन में मानसिक शांति, आर्थिक समृद्धि और पारिवारिक सौहार्द भी लाते हैं. घर के दरवाजे-खिड़कियों पर लगाए जाने वाले परदों का रंग वास्तु की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. आइए जानें कि किस दिशा और व्यक्ति के लिए कौन सा रंग शुभ माना गया है और क्यों.

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आधुनिक समाज के दिखावे और बाहरी चमक में खोते मानवीय मूल्यों को दर्शाती प्रतीकात्मक कलात्मक छवि।

दोगले दिखावे में डूबी सभ्यता

यह कविता आधुनिक समाज के दिखावे, दोगलेपन और खोते मानवीय सलीके पर सवाल उठाती है। बाहरी चमक और भाषा के आडंबर में दबते चरित्र और विचारों की मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करती है।

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