बारिश में जलता हुआ दीपक और दूर खड़ा प्रेमी युगल – प्रेम पर आधारित भावपूर्ण हिंदी कविता

अनमोल सौगात हो तुम

जब कोई व्यक्ति हमारे जीवन में उम्मीद, सुकून और नई शुरुआत बनकर आता है, तो शब्द अपने आप कविता बन जाते हैं। “आंधियों में जलते दिए की बात हो तुम” ऐसी ही एक भावपूर्ण प्रेम कविता है, जिसमें प्रेम को पहली बरसात, उम्मीद की लौ और जीवन की अनमोल सौगात के रूप में महसूस किया गया है। हर पंक्ति दिल की गहराइयों से निकले जज़्बातों को सहज और खूबसूरत अंदाज़ में व्यक्त करती है।

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कॉलेज की भीड़ में अकेला और मानसिक तनाव से जूझता एक युवा छात्र।

भीड़ में अकेला

“भीड़ में अकेला” एक संवेदनशील हिंदी कहानी है, जो युवाओं के भीतर चल रहे मानसिक संघर्ष, सामाजिक दबाव और संवाद की कमी को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। यह कहानी बताती है कि समय पर समझ, प्रेम और संवाद किसी की जिंदगी बदल सकते हैं।

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विटामिन डी सिर्फ हड्डियों का नहीं, दिमाग, दिल और इम्यून सिस्टम का भी छुपा रक्षक

सिर्फ हड्डियों का नहीं विटामिन डी

थकान, डिप्रेशन और दिल से जुड़ा अनदेखा रिश्ता भारत को सूरज का देश कहा जाता है, फिर भी एक चौंकाने वाली सच्चाई सामने है. हर दस में से लगभग आठ भारतीयों में विटामिन डी की कमी पाई जाती है. वर्षों तक हमें यही सिखाया गया कि विटामिन डी केवल हड्डियों के लिए जरूरी है. सच…

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भारत भवन में पत्रकारिता और मीडिया के मुद्दों पर चर्चा करते वरिष्ठ पत्रकारों की परिचर्चा।

खबर में ड्रामा और पत्रकारिता का मापन तय हो : त्रिवेदी

भारत भवन में आयोजित ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ पत्रकारों ने पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, पेड न्यूज, एआई, डिजिटल मीडिया और मौलिकता जैसे मुद्दों पर गंभीर विचार साझा किए। वक्ताओं ने पत्रकारिता में आत्मावलोकन और जिम्मेदारी को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।

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नारी — जननी भी, शक्ति भी

नारी गहनों या दौलत की चाह नहीं रखती, उसे चाहिए सिर्फ़ सम्मान और बराबरी का हक़। वह माँ है, बहन है, बेटी है और पत्नी है—हर रूप में जीवन को सँवारती है। उसके भी अपने सपने हैं, अपनी इच्छाएँ हैं। लेकिन समाज अक्सर उसे कमज़ोर समझकर उसकी स्वतंत्रता छीनने की कोशिश करता है। सच्चाई यह है कि नारी कोमल ज़रूर है, पर निर्बल नहीं। वह कर्तव्यों का पालन करती है और प्रेम से जीती है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उसकी भावनाओं और अस्तित्व का सम्मान करें।

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हाँ, मौन हूँ मैं कहानी

हाँ, मौन हूँ मैं

कभी-कभी स्त्री इसलिए मौन नहीं होती कि उसके पास कहने को कुछ नहीं होता, बल्कि इसलिए कि उसके शब्दों को सुनने वाला कोई नहीं होता। ‘हाँ, मौन हूँ मैं’ एक ऐसी लेखिका की कहानी है, जिसने अपने प्रेम और रिश्ते को बचाने के लिए अपने सपनों को चुप करा दिया, लेकिन अंततः उसका मौन समझा गया और उसके शब्दों ने फिर जन्म लिया।

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साहित्य पुरस्कार प्राप्त करती मुस्कुराती महिला, जिसके चेहरे पर संघर्ष से मिली सफलता की चमक है।

अव्वल दर्जे की बेवकूफ़

बार-बार ‘अव्वल दर्जे की बेवकूफ़’ कहकर अपमानित की गई सीमा ने हार नहीं मानी। धैर्य, संघर्ष और अपनी लेखनी के बल पर उसने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी जीत भी हासिल की। यह एक संवेदनशील और प्रेरक हिंदी कहानी है।

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किशोरावस्था की मानसिक उलझन और मध्यांतर की अवस्था को दर्शाती संवेदनशील हिंदी कविता

अदृश्य पहरा

यह कविता न बचपन और न जवानी की उस मध्यांतर अवस्था को स्वर देती है, जिसे किशोरावस्था कहा जाता है। बदलती आदतों, माता-पिता की अपेक्षाओं और सामाजिक दबावों के बीच फँसे किशोर मन की उलझन और पीड़ा को यह रचना संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त करती है।

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बेटियों का दर्द

बेटियाँ अपने मन का दर्द बार-बार चीख़ कर कहना चाहती रहीं। उनकी मासूम आँखों से गिरते आँसू और थरथराती आवाज़ें उनके भीतर छिपी पीड़ा का सबूत थीं। पर अफ़सोस, इस दुनिया ने उन चीख़ों को कभी सुनना ही नहीं चाहा। उनके शब्द हवा में गूँजते रहे, मगर कानों तक पहुँचने से पहले ही जैसे दीवारों से टकराकर बिखर जाते। समाज की बेरुख़ी इतनी गहरी थी कि मानो किसी को कोई ख़बर ही न हो कि बेटियाँ टूट रही हैं, बिखर रही हैं और भीतर ही भीतर मर रही हैं।

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स्त्री : ‘एक मैनुअल’

समाज ने औरत के अस्तित्व को एक ऐसे समीकरण में बैठाया है जो कभी भी अपना फॉर्मूला बदल सकता है मनचाहा उत्तर पाने के लिए । व्यंग है दोहरे मापदंड वाले समाज पर जो औरत को हर पल एक स्केनर के नीचे रखता है ।

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