Realistic scene of a tired young woman sitting alone in a dim, cluttered room during rain, with wet clothes hanging, cats nearby, and a phone on the floor showing missed calls, expressing guilt and emotional heaviness, with a blurred train visible outside the window.

छूटी हुई फोन कॉल्स के संकट …

यह रचना एक छूटी हुई कॉल के बहाने मनुष्य के भीतर छिपे अपराधबोध, थकान और रिश्तों की अनकही दूरियों को उजागर करती है। रोज़मर्रा की भागदौड़, शारीरिक पीड़ा और मानसिक उलझनों के बीच छूटे छोटे-छोटे क्षण किस तरह गहरे पछतावे में बदल जाते हैं, यही इसका केंद्र है। एक साधारण-सी छूटी कॉल यहाँ जीवन के बड़े संकट, टूटते संबंधों और भीतर की असुरक्षा का प्रतीक बन जाती है।

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शून्यता और अकेलेपन को दर्शाता एक व्यक्ति, जो विचारों के सागर में खोया हुआ है

मुझमें कुछ भी नहीं है जिंदा..

आज के दौर में, जब हर व्यक्ति भीड़ का हिस्सा बनता जा रहा है, उसकी सबसे बड़ी लड़ाई खुद से ही है। “शून्यकाल” कविता इसी आंतरिक संघर्ष और अस्तित्व की खोज को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करती है। कविता में ‘मैं’ का पात्र खुद को खाली और शून्य महसूस करता है, जहाँ शब्द तो हैं, पर उनके पीछे कोई ठोस अर्थ नहीं बचा।

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मैं मुक्त होना चाहती हूँ

मैं मुक्त होना चाहती हूँ…

मैं मुक्त होना चाहती हूँ — यह सिर्फ एक ख्वाहिश नहीं, बल्कि मेरी आत्मा की पुकार है। उन अदृश्य ज़ंजीरों से आज़ाद होने की चाह, जो मेरे विचारों, रिश्तों और सपनों को जकड़े हुए हैं। यह एक सफर है खुद को पहचानने का, अपने भीतर के डर को हराने का, और उस जीवन को जीने का, जहाँ मैं बिना किसी शर्त के खुद को स्वीकार सकूँ।”

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“जब दिल धड़कता रहा, पर होंठ चुप रहे”

इतने सालों के बाद जब पीछे लौटकर देखता हूं, तो लगता है प्रेम और सौभाग्य कई बार मेरे दरवाज़े तक आए थे—पर मैं ही झेंपू, अनाड़ी और मौक़ा चूक जाने वाला रहा। कॉलेज की वो लड़की, लाइब्रेरी का वो एकांत, और वो घड़ी जब किसी के घर का पावभाजी मेरी याददाश्त का स्थायी हिस्सा बन गई—सब मुझे आज भी टटोलते हैं। और जब एक दिन किसी ने कहा, “तुम्हें ब्राह्मण समझकर बहन के लिए पसंद किया था,” तो लगा, क्या प्रेम जाति का मोहताज होता है?

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war battlefield with soldier and emotional mother with child, symbolizing pain of war and hope for peace

जब तितलियाँ सरहदों से परे उड़ती हैं

“युद्ध में न कोई जीतता है, न कोई हारता…
जो सबसे भयावह युद्ध होते हैं,
वो मांओं, पत्नियों और बच्चों के भीतर
बिना हथियार लड़े जाते हैं।
काश! तितलियाँ सरहदों से परे
एक ऐसे देश में ले जाएं,
जहां सिर्फ फूल हों,
और मां की गोद ही अंतिम शरण हो।”

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A lone Indian devotee performing dandavat parikrama on a forest path under full moonlight near Giriraj Hill, surrounded by calm nature, reflecting devotion, surrender, divine protection, and spiritual peace.

प्रेम, परिक्रमा और प्रसाद : जंगल में प्रभु की लीला

गिरिराज जी की दंडवती परिक्रमा केवल यात्रा नहीं, बल्कि समर्पण और कृपा का साक्षात अनुभव है। एकाकी पथिकों से भेंट, अस्वस्थता में प्रभु की सहायता, अजनबी हाथों से मिला प्रसाद, जंगल में जल-अन्न और रात्रि की पूर्णिमा में गिरिराज का सान्निध्य हर क्षण यह अनुभूति देता है कि जहाँ विश्वास है, वहाँ प्रभु स्वयं मार्गदर्शक बन जाते हैं।

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फिर से… सिर्फ अपने लिए

रेखा ने बचपन में जो कहानियाँ लिखना शुरू किया था, वो ज़िंदगी की दौड़ में कहीं खो गया था। लेकिन एक पुरानी सहेली की एक बात ने उसके भीतर की सोई हुई लेखिका को फिर जगा दिया। धूल भरी कॉपी, सूखे फूल, और अधूरी कहानियाँ — सब फिर से ज़िंदा हो उठे। कभी-कभी ज़िंदगी वहीं से शुरू होती है, जहाँ हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है।

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विरासत में मिली करुणा, कर्म में उतरी सेवा

“सेवा का भाव मेरे लिए कोई काम नहीं, जीवन का उद्देश्य है।”ये शब्द उस संवेदनशील समाजसेवी के हैं जिन्होंने कोरोना काल से लेकर आज तक मूक पशुओं, पक्षियों, जरूरतमंदों और असहायों के लिए अथक सेवा की है। चाहे पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था हो, गौशाला में चारे की सेवा या फिर बेड रिडन मरीजों के लिए निःशुल्क उपकरण हर कार्य में करुणा, प्रतिबद्धता और पारिवारिक संस्कारों की झलक मिलती है।

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बच्चों को खुद चुनने दीजिए उनका सुर

एक पिता ने अपने बेटे को ज़बरदस्ती शास्त्रीय संगीत की कक्षा में भेज दिया, जबकि बच्चे को संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यह लेख बताता है कि कैसे माता-पिता अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर थोपते हैं और क्यों यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति—चाहे किसी भी उम्र का हो—अपने ही सपनों को पूरा करने का प्रयास करे। बच्चों को उनकी पसंद का रास्ता चुनने देना ही सच्ची परवरिश है।

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“बृज की रज, रबड़ी और राधा

गोवर्धन की परिक्रमा कोई साधारण यात्रा नहीं, यह आत्मा की तपस्या है। 27 से 30 सितंबर तक की इस दंडवती परिक्रमा में मैंने न केवल शरीर को बल्कि हृदय को भी बृजरज में लोटते पाया। हर कदम, हर प्रणाम में बृज का माधुर्य, भक्ति की ऊष्मा और सेवा का भाव समाया था। भक्तों का प्रेम, रास्ते के भंडारे, बुजुर्गों की प्रेरणा और मित्र का साथ — सबने मिलकर यह यात्रा एक दिव्य अनुभव बना दी। राधा कुंड में स्नान से लेकर कुसुम सरोवर की विद्युत छटा तक, हर पड़ाव ने मुझे भीतर तक छू लिया। यह यात्रा थी—तन की थकान को तज कर मन की शांति पाने की।

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