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बड़की

संयुक्त परिवार की रसोई सिर्फ़ खाना पकाने की जगह नहीं होती, वहाँ रिश्तों की आँच भी सुलगती है।
सुनीता को आज समझ आया कि कमाना ही पर्याप्त नहीं, घर के कामों में हाथ बँटाना भी उतना ही ज़रूरी है। बड़ी भाभी ललिता की चुप्पी में शिकायत नहीं, थकान छिपी थी उस जिम्मेदारी की जो उन्होंने बरसों से बिना शोर उठाई थी। कभी-कभी रिश्तों में तकरार इसलिए नहीं होती कि कोई गलत है, बल्कि इसलिए कि कोई दूसरे की थकान देख नहीं पाता।

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वो कुछ लोग…

ज़िंदगी भी एक ट्रेन की तरह है — जो धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ते हुए हमें आगे ले जाती है। हर पड़ाव पर कुछ न कुछ पीछे छूट जाता है — कोई शहर, कोई गलियां, कुछ अपने लोग। लेकिन जो सच में हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके होते हैं, वे कभी पूरी तरह नहीं छूटते। वे ठहरे रहते हैं — हमारी यादों में, हमारी भावनाओं में, और उस अगली मुलाक़ात की उम्मीद में, जैसे स्टेशन पर खड़े वे लोग जो ट्रेन गुज़र जाने के बाद भी कुछ देर तक हाथ हिलाते रहते हैं… यादें, उदासी और इंतज़ार लिए।

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बचपन की दीवाली : यादों की मिठास

बचपन की दीवाली में हर चीज़ में मज़ा और उत्साह होता था—धूप में फूलते गद्दे, मम्मी-चाची का त्योहार नाश्ता, और पापा का हाथ का फ्रूट क्रीम। आज की सुविधाओं के बावजूद वह मासूमियत और उत्सुकता कहीं खो सी गई है, लेकिन यादें हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहती हैं।

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असली दीवाली: दिखावे नहीं, परिवार की खुशहाली में

डाॅ उर्मिला सिन्हा प्रसिद्ध साहित्यकार, रांची (झारखंड) दीवाली का त्यौहार आ पहुंचा।गौरी साफ-सफाई, रंग-रोगन, पूजा की तैयारी… बेटे की प्रतियोगी परीक्षा, बिटिया का फाइनल एग्जाम… बूढ़े सास-ससुर की देखभाल… पति के नखरे अलग… क्या करे, क्या छोड़ दे।सीमित आमदनी, खर्चे हजार… नाते-रिश्तेदारों का स्वागत-सत्कार। एक आम मध्यमवर्गीय, संवेदनशील परिवार की यही कहानी।खैर, काम निबटते गए……

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खामोश रात…

यादों के दरिए पर जब किसी खास की यादों की आहट आती है, तो रात खामोश होकर भी गहराई से बोलती है। “खामोश_रात” में मन की बेचैनी, अंतहीन यात्रा और इंतजार की भावनाएँ बुनकर एक शांत, संवेदनशील दृश्य रचा गया है, जहाँ रात की चुप्पी भी अपने आप में एक कहानी कहती है।

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वो पल…

सपना चन्द्रा , कहलगांव, भागलपुर (बिहार) कुछ तो था उस पल में —चाँद, कबूतर, सफेद बादल,लालिमा ओढ़े उगता सूरज,और टिप-टिप बरसतीबूँदों की रिमझिम बरसात,इंद्रधनुष की सतरंगी पट्टी। जाने कब इन आँखों में कैद हुईचलती-फिरती हरेक तस्वीर,चाहा उतार लूँ कागज परएक सुंदर सी तस्वीर,उस छोर को याद करते हुएजिससे मैं बंधी थी,मगर उलझी हुई सी। पर…

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मोती जैसे महुआ

भोर की नर्म रोशनी में पेड़ों से टपकते महुआ के फूल, मानो धरती पर बिखरते मोती हों — यही है इस कविता का मूल दृश्य। “मोती जैसे महुआ” में बाल-सुलभ जिज्ञासा और प्रकृति की सादगी का संगम है। दादी की डलिया, महुआ की सोंधी ख़ुशबू और उस क्षण की नीरवता — सब मिलकर एक ऐसे ग्रामीण सौंदर्य को रचते हैं, जहाँ हर फूल जीवन की मिठास और श्रम की सुगंध से भरा है।

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विजया निमला: ज़िंदगी की हर दौड़ में विजेता

57 वर्षीय विजया निमला के लिए रनिंग सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि ज़िंदगी का रूपक है। स्लिप डिस्क, फ्रैक्चर और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी शारीरिक चुनौतियों को उन्होंने कभी अपनी मंज़िल के बीच नहीं आने दिया। फैशन डिज़ाइनिंग, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ, समाजसेवा और फिटनेस — इन सभी को सहजता से संतुलित करते हुए उन्होंने यह साबित किया है कि उम्र सिर्फ एक संख्या है। अपने पति राजेंद्र निमला और फिटनेस-प्रेमी बच्चों के साथ उन्होंने जीवन की हर दौड़ में जीत हासिल की है और हर फिनिश लाइन को एक नई शुरुआत में बदल दिया है।

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दिलरुबा और दिल

बिट्ट जैन सना, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई काम आई न दिल्लगी दिल की।ये कभी क्या हुई किसी दिल की। इश्क़ वालों के साथ ही अक्सर।ज़ेह्न से दुश्मनी हुई दिल की। आशिक़ी में है सिर्फ़ आह-ओ-फ़ुग़ाँ,कब हुई किसको आगही दिल की। दिल हमेशा जवान रहता है,उम्र बढ़ती नहीं कभी दिल की। आज उस दिलरुबा को देखा तो,ख़ुद-ब-ख़ुद…

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अकेले हैं, तो क्या ग़म है…

अकेलापन अंत नहीं, एक नया आरंभ है। यह वह समय है जब आप खुद को, अपनी रुचियों को और अपने जीवन के अनुभवों को नए सिरे से जी सकते हैं।अकेले होने का अर्थ यह नहीं कि आप असहाय हैं, बल्कि इसका अर्थ है कि अब आपके पास स्वयं को समझने और जीवन को अपने तरीके से जीने का अवसर है।

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