ये मूर्तिकार

यह मूर्तिकार, जो छेनी-हथौड़ी से पत्थरों को तराशते-तराशते खुद भी एक पाषाण शिला सा बन गया है। उसके भीतर का प्रेम कहीं उसकी बनाई मूर्तियों में समा गया, या कहें कि बुत बनकर रह गया। कल जो प्रेम से लबालब था, आज वह भीतर से सूख चुका है—दरकती पपड़ी जैसा। समय की नश्वरता को समझते हुए भी उसने उसे नज़रअंदाज़ किया, क्योंकि उसके जीवन में अब बस औज़ारों का ही महत्व रह गया है। यही औज़ार उसके जीवनयापन का साधन हैं, उसकी भूख मिटाने का माध्यम हैं—उसका एकमात्र साथ।

Read More

सवाल मैं, जवाब में सन्नाटा

वो सबके लिए मोहब्बत बरसाता है, लेकिन मुझे किसी तमाशे की तरह अनदेखा कर देता है। उसकी रहमतें जब हर गली को भिगोती हैं, तब भी मैं सूखी ही रह जाती हूँ। जिसे कभी पलकों पर बिठाया था, वही मेरी आँखों में कांटे चुभो जाता है। मैं अपने सवालों में उलझी रहती हूँ, और वो जवाबों में सन्नाटा छोड़ जाता है। दूसरों की ज़िंदगी में वो सौ रंग भर देता है, मगर मेरे हिस्से हमेशा अंधेरा ही आता है। वो खुद भीड़ का हिस्सा बनकर चल पड़ता है, और मुझे तन्हाई में छोड़ जाता है। जब भी लौटता है शहर से, “गौरी”, तो बस उदासी का कोई नया किस्सा दे जाता है।

Read More
घर में उदास बैठा पिता और मोबाइल में व्यस्त बच्चे, बदलते पारिवारिक रिश्तों का दृश्य

बाप रे बाप

यह व्यंग्यात्मक लेख “बाप रे बाप” भारतीय समाज में “बाप” की बदलती छवि और उसकी सामाजिक स्थिति पर तीखा लेकिन हास्यप्रद कटाक्ष करता है। कभी परिवार का केंद्रबिंदु और अनुशासन का प्रतीक रहा “बाप”, अब अपने ही बच्चों और समाज के व्यवहार से हास्यास्पद स्थिति में आ गया है। बेटे बाप के नाम पर ऐश करते हैं, पर उसकी इज्जत नहीं रखते। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारों तक, हर कोई “बाप” बनने की होड़ में है — असली अर्थों में नहीं, बल्कि रुतबे के लिए। लेख एक गहरी सामाजिक विडंबना की ओर इशारा करता है, जहाँ बाप अब ATM, चेकबुक, और ज़रूरत पड़ने पर जेब से निकाली जाने वाली वस्तु बनकर रह गया है।

Read More

श्रम आधार

यह कविता कर्म, समर्पण और श्रम के प्रति निष्ठा को दर्शाती है। इसमें कर्मवीरों की जीवन-दृष्टि को उकेरा गया है—चाहे परिणाम हार हो या जीत, वे निरंतर लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। उनके लिए श्रम ही पूजा है और यही उनका धर्म भी। कविता यह संदेश देती है कि मन में संकल्प की ज्वाला हो, तो मनमोहक सपनों को भी साकार किया जा सकता है। ऋतुओं के बदलाव की तरह ही समय का संदेश है कि सेवा, संयम और श्रम से ही समाज सुखी बनता है। यही नहीं, कविता एक सिपाही की वीरता को भी चित्रित करती है, जो फौलादी सीने में विश्व विजय का सपना लिए रणभूमि में हुंकार भरता है। कुल मिलाकर, यह रचना कर्म, सेवा और श्रम की शक्ति का उत्सव है।

Read More

उज्जैन फिर उज्जयिनी हो जाए

उज्जैन को उज्जयिनी नाम से फिर पहचान दिलाने का प्रयास चल रहा है — एक ऐसी नगरी जो विक्रमादित्य की राजधानी रही, कालिदास और भर्तृहरि की कर्मभूमि रही और जिसे साहित्य, ज्योतिष, संस्कृति और खगोल-विज्ञान की जन्मस्थली माना गया। पंडित सूर्य नारायण व्यास ने विक्रमादित्य की विरासत और उज्जयिनी के गौरव को पुनर्स्थापित करने में महती भूमिका निभाई। आज उज्जैन धार्मिक पर्यटन का केंद्र तो बन गया है, लेकिन उस उज्जयिनी का साहित्यिक, सांस्कृतिक वैभव खोता जा रहा है। अब समय है कि उज्जयिनी को उसका प्राचीन गौरव फिर से मिले — नाम से, संवत् से और सांस्कृतिक पहचान से।

Read More

शरीर को स्वस्थ, मन को निर्मल बनाता है योग

योग केवल एक शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक शांति, आत्मचिंतन और संतुलित जीवन का माध्यम है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, तनाव और बेचैनी से मुक्ति का सरल, सस्ता और प्रभावी उपाय है योग। यह न सिर्फ शरीर को सशक्त करता है बल्कि मन को भी स्थिरता, ऊर्जा और सकारात्मकता से भर देता है। योग वह शक्ति है जो जीवन को दिशा, उद्देश्य और संतुलन प्रदान करती है।

Read More

‘मन निर्मोही’

स्वाभिमान की चोट से आहत मन ने पहले सहजता से सहा, फिर आक्रोशित होकर न्याय की उम्मीद में संघर्ष किया। विश्वविद्यालय और सचिवालय की सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते उसने सच्चाई के दबे-सिसकते स्वर को देखा। छल और प्रपंच के बीच भी उसने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा। परंतु जब न्यायालय की प्रक्रिया भी ठंडी पड़ी मिली, तो अंततः मन निर्मोही हो गया।

Read More

टैरो कार्ड्स: भविष्य नहीं, आत्म-खोज की एक यात्रा

“टैरो कार्ड्स अब केवल भविष्य बताने का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे भीतर के मौन से संवाद करने का एक सशक्त साधन हैं। ये प्रतीकात्मक चित्र हमारे मन की परतों को खोलते हैं, और हमें खुद से जुड़ने का अवसर देते हैं।”

Read More

पास होकर भी दूर: दो दिलों की ख़ामोश मोहब्बत

“कुछ रिश्ते होते हैं, जो बिना नाम के भी ज़िंदा रहते हैं। न वे समाज से मान्यता चाहते हैं, न किसी वादे की ज़रूरत होती है। बस एक मौन जुड़ाव होता है—जिसमें न कोई अधिकार होता है, न अपेक्षा। चितरा और सत्य का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था—जहां भावनाएं थीं, गहराई थी, पर कोई दावा नहीं था। यह प्यार था, लेकिन ऐसा प्यार जो छूने से पहले ही समझ जाता है, जो मिलने से पहले ही विदा ले लेता है। एक ऐसा रिश्ता जिसे शब्द नहीं बाँध सकते, पर आत्मा पहचान लेती है।”

Read More

मेरी नजरों में नेपाल — जैसा देखा, जैसा समझा

“अगर अलग मुद्रा की पहचान न होती, तो कभी न जान पाती कि किसी और ज़मीन पर हूँ!”
नेपाल—एक ऐसा देश, जहाँ हर गली, हर मोड़ पर आस्था की झलक है। साधारणता में भी गरिमा है, और गरीब कहलाने के बावजूद आत्मसम्मान की ऐसी मिसाल देखने को मिली जो अमीर देशों को भी सीख दे सके। महिलाएं व्यापार की कमान संभालती हैं, ईमानदारी हर चेहरे पर झलकती है, और हिंदी को जिस तरह से अपनाया गया है, वह दिल को छू जाता है। यह यात्रा केवल एक देश की नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव की रही।

Read More