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मुआवज़ा

गंगा घाटी की बाढ़ ने न जाने कितने घर उजाड़ दिए। लोचू के पिता भी उसी बाढ़ में लापता हो गए। तीन दिनों से परिवार उनकी खोज में भटक रहा था। घर में मातम था, पर जब टीवी पर “मुआवज़े” की खबर चली — 94 लाख रुपए का — तो लोचू की प्रार्थना बदल गई। अब उसके भगवान से माँग पिता की सलामती नहीं, बल्कि मुआवज़े की रकम की थी।

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तेरी बिंदिया रे…..

जहां शायरों ने, कवियों ने, औरत की सुंदरता के लिए अनेकों उपमानों का प्रयोग किया है, जैसे झील सी गहरी आंखें, हिरण सी सुंदर आंखें, सुराही दार गर्दन, मोरनी सी चाल, वहीं एक प्रेमी, अपनी प्रेमिका की बिंदी पर मर मिटा है,और वह चाहता है कि चाहे वह और कोई श्रृंगार करें या ना करें ,सिर्फ एक छोटी सी बिंदी वह अपने माथे पर लगा ले, और उसे किसी भी उपमान की जरूरत नहीं होगी।

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एक मुलाकात दीवारों के साथ

एक दीवारों से मुलाकात का अनुभव, जहाँ बचपन, जवानी और यादों की आवाज़ें जीवंत हो उठती हैं। दीवारें सिर्फ मकान का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे एहसासों, मासूमियत और शरारतों की साझेदार होती हैं। समय के रंग और स्मृतियों की गूंज दीवारों पर जिंदा रहती है, और एक छोटी सी बॉल, एक बच्चा, और पुरानी यादें हमें हमारे अतीत की ओर खींच लेती हैं।

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हॉर्न प्लीज !

बचपन से गाड़ियों पर लिखे इस छोटे से शब्द को बड़े गौर से पढ़ते चले आ रहे हैं।छोटे में ज़ब पापा की गाड़ी का हॉर्न बजा देती थी तो पापा बहुत गुस्सा होते थे, बोलते थे कि ये हॉर्न तब बजाते हैं ज़ब हमें साइड की आवश्यकता हो। लोग हॉर्न की आवाज सुनकर एक तरफ हो जाते हैं।

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असुंदर है

*“असुंदर है”* समाज के विकृत चेहरों को उजागर करने वाली रचना है। कवि ने इस कविता में बार-बार “असुंदर है” कहकर हमारे भीतर और हमारे समाज में फैली उन कुरूप सच्चाइयों की ओर ध्यान दिलाया है, जिन्हें हम सामान्य मानकर अनदेखा करते रहते हैं।
कवि कहता है कि असुंदर है जब मनुष्य, मनुष्य के साथ भेदभाव करता है — किसी को महान और किसी को तुच्छ समझता है। यह असुंदर है जब पुरुष को मोक्ष का अधिकारी माना जाता है और स्त्री को पैरों की जूती समझा जाता है। असुंदर है जब पत्थरों को ईश्वर कहा जाता है, लेकिन मनुष्यों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता है।
गाँव के बीच मंदिर बनाना और कुछ लोगों को गाँव के बाहर बसाना भी असुंदर है। पत्थरों की पूजा करते हुए उन्हीं पर पशुओं की बलि चढ़ाना और जाति-धर्म के नाम पर लोगों को बाँटकर आपस में लड़ाना भी असुंदर है।

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रह गया तो रह जाने दो

जीवन क्षणभंगुर है, और प्यार भी कुछ लम्हों का होता है। कभी-कभी साथ रहते हुए भी पल दूर हो जाते हैं। यादें, थोड़ी खुशी और थोड़े ग़म के साथ, हमें हर पल जीना सीखना होता है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा, इसलिए हर अनुभव को पूरी गहराई से महसूस करना ही जीवन का सार है।

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जीवन के गीत गाते चलो

जीवन में अंधेरा, आंधियां और कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन विश्वास और साहस के साथ चलना ही जीवन का सार है। दुखों से आँखें मिलाकर आगे बढ़ते हुए, दीप जलाते और खुशियाँ मनाते हुए हम अपने जीवन के गीत गाते रहें। यही प्रयास हमें भीतर और बाहर दोनों जगह उजाला देने का सामर्थ्य देता है।

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तीर्थ : आत्मा की यात्रा

तीर्थ केवल स्थान नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। जब जीवन की भागदौड़ में मन थक जाता है, तीर्थ हमें भीतर की शांति और ईश्वर के सान्निध्य की ओर ले जाता है। भारत के चार धाम बद्रीनाथ, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी और द्वारका सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। तीर्थ यात्रा हमें अपने भीतर झाँकने, अहंकार छोड़ने और देश, संस्कृति व आत्मा से जुड़ने का अवसर देती है।

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यादों की बारिश

बीता हुआ अतीत अक्सर हमारे नयनों के सामने पल भर में जीवित हो जाता है, भूले-बिसरे गीत और बचपन की यादें याद दिलाते हैं। प्रेम, स्मृतियाँ और खोए सपने हमें बार-बार छूते हैं, चाहे हम कितनी भी ताकत जुटाएँ। कुछ यादें इतनी गहरी होती हैं कि उन्हें भुलाया नहीं जा सकता . वे हमेशा हमारे मन और दिल में जीवित रहती हैं।

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रोशनी के दोहे

दीपों के इस पर्व में घर-घर उजाला फैलता है और खुशियाँ अपार होती हैं। सज-धज कर बाजारों में रौनक है, फूल और मिठाइयाँ बिक रही हैं। हर मन में राम की ज्योति बसती है और प्रीति व उजाला हर ओर दिखाई देता है। अहंकार और वहम को छोड़कर प्रभु का नाम जपने से, अच्छे कर्मों के माध्यम से सुख और शांति प्राप्त होती है।

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