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ग़ज़ल 

जब दिल के मचलते भाव किसी अक्षर को ढूँढ लेते हैं, तो उन्हें बयान करने का अंदाज़ भी खोज लिया जाता है। जिन्हें उड़ने की चाहत होती है, वे पर ढूँढ लेते हैं और ज़मीन पर रहते हुए भी अपना आसमान पा लेते हैं। बच्चे बिना समझे पराए के अंतर को भी पहचान लेते हैं। उन्हें कमजोर करना आसान नहीं होता, क्योंकि अँधेरे में भी वे अपने मार्ग को प्रकाशमान बना लेते हैं। जो अपनी किस्मत खुद लिखते हैं, उन्हें अपने प्रयास पर विश्वास होता है और अवसर अपने आप ढूँढ लेते हैं। जिनके लिए मकान पक्का हो या न हो, वे सियासत के ज्वलनशील शोले भी पार कर लेते हैं। यह शरीर मिट्टी का बना है और मिट्टी में ही लौटना है, फिर भी वे अपनी आत्मा के दूसरे रूप को खोज लेते हैं। जब तक साँस चलती है, अर्चना को भी फुर्सत नहीं होती, फिर भी कुछ पल के लिए सुकून पा लेते हैं।

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धैर्य का प्रतिफल

यह कविता धैर्य और perseverance का संदेश देती है। जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, समय, लगन और सही प्रयास से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। कवि ने साधारण उदाहरणों — पक्षियों का धीरे-धीरे नीड़ बनाना, पर्वत चढ़ाई, अर्जुन की वीरता — के माध्यम से समझाया है कि धैर्य एक ऐसा गुण है, जो अंततः सफलता और फल की प्राप्ति कराता है। यह कविता आत्म-प्रेरणा और मानसिक दृढ़ता की भावना को गहरे रूप में उजागर करती है।

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आधे गीत , अधूरा जीवन

यह कविता कृष्ण और राधा के अधूरे मिलन और आधे गीत की पीड़ा को व्यक्त करती है। कवि अपने मन में बंसी की तान सुनते हुए राधा जैसा जीवन जीने की चाहत व्यक्त करता है। अधूरी आकांक्षाएँ, जंजीरों को तोड़कर आज़ादी पाने की तड़प, और पुनर्जन्म में फिर से कृष्ण को देखने की प्रार्थना कविता के भावों को गहरा और मार्मिक बनाती है। यह कविता प्रेम, विरह और आधे जीवन की अधूरी तृप्ति को दर्शाती है।

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मैंने समंदर देखा

गोधूलि बेला में सुनहरी रश्मियों से जगमगाता समंदर, हवा और लहरों के खेल के बीच दो प्रेमियों की पहली निकटता की कहानी। लेखक ने समंदर, लहरों और हवा की प्राकृतिक सुंदरता के साथ पात्रों की नज़रों, झुमके और बेली के गजरे के माध्यम से रोमांच और रोमांस को जीवंत किया है। हर विवरण में वातावरण और संवेदनाएँ इतनी वास्तविक लगती हैं कि पाठक खुद उस समंदर किनारे मौजूद होने का अनुभव करता है। यह कहानी प्रकृति और प्रेम के बीच की नाजुक संतुलन और पहले स्पर्श की ऊष्मा को उजागर करती है।

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नीला आसमां

यह कविता एक शांत और भावपूर्ण नीले आसमां के माध्यम से मन की भावनाओं को व्यक्त करती है। मन पर लगे गहरे दाग और संताप, जैसे आसमां का नीला स्वरूप, आँखों के कोरों पर ढलते आँसुओं के साथ मिलकर भावनाओं को उजागर करता है। बिन मौसम की बारिश की तरह मन और आसमां दोनों के धुल जाने से अंततः शांति और स्वच्छता की अनुभूति होती है। यह कविता आंतरिक संताप और उसके समाधान की संवेदनशील यात्रा को दर्शाती है।

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भजन : हे माता कहो क्या त्रुटि हुई

इस भजन में एक भक्त अपनी माता से प्रकट पश्चाताप और सवाल उठाता है — “हे माता, कहो क्या त्रुटि हुई, मुझसे हुआ क्या पाप?” वह दिन-रात माता की सेवा में लगा रहता है, अपने स्वाभिमान और कर्तव्य के बीच उलझा हुआ। भजन में पत्नी की असहायता, आत्म-संदेह और ईश्वर के प्रति श्रद्धा का मिश्रण दिखाई देता है। हर पंक्ति में उसके हृदय की पीड़ा, पछतावा और भक्ति स्पष्ट है, जबकि माता और देवताओं के प्रति उसका समर्पण उसकी आस्था को उजागर करता है। यह भजन पश्चाताप और विश्वास के बीच की संवेदनशील यात्रा का प्रतीक है।

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स्वाभिमान

हर रोज मैट्रो स्टेशन पर भीख मांगती वह अंधी भिखारन मेरी नजरों के सामने होती।
एक दिन उसकी तबियत ठीक न होने पर मैंने देखा कि उसकी देखभाल एक जवान लड़की कर रही थी। कई सालों के दर्द और असहायता के बावजूद, उस बच्ची ने उसकी सेवा को अपना स्वाभिमान बना लिया। भीख मांगना नहीं, बल्कि सहयोग और मानवता की यही असली पहचान है।

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हिंदी साहित्य भारती : राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ का गठन

हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित अंतरराष्ट्रीय संस्था हिंदी साहित्य भारती ने मुंबई, महाराष्ट्र में राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ की नई इकाई का गठन किया।

कार्यक्रम का आयोजन द प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब में किया गया, जिसकी अध्यक्षता श्रीमती संजना लाल ने की। महानगर कोलकाता से पधारी डॉ. सुनीता मंडल, अध्यक्ष, हिंदी साहित्य भारती राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ, ने सभी साहित्यकारों और कवयित्रियों का स्वागत करते हुए महिला प्रकोष्ठ की कार्यप्रणाली और उद्देश्यों को साझा किया।

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लड़कों से कोई नहीं पूछता ख़ैरियत

काफ़ी वक्त हो गया है,
अब कोई नहीं पूछता लड़कों से ख़ैरियत।
किसी को दिलचस्पी नहीं रहती यह जानने में कि वो ठीक हैं या नहीं।उनसे बस पूछा जाता है उनकी हैसियत, सैलरी और सफलता के पैमाने।ज़रा-सा पीछे रह जाने पर उनके हिस्से में आती हैं . आलोचना, तंज और एक लंबी चुप्पी,जिसमें उनका मन ख़ुद से ही लड़ता रहता है।

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औषध या टोना

“ज्ञान जब अज्ञान में डूब जाए तो टोना कहलाता है…
पर समझो तो वही औषध है, वही विद्या।” गाँव के लोग जिन शब्दों को मंत्र समझते थे, वे दरअसल उपचार थे और जिस औरत को ‘डायन’ कहा गया, वही जीवन लौटाने वाली वैद्य निकली। विश्वास और अंधविश्वास की पतली सरहद उस रात फिर धुंधली हो गई।

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