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त्यौहार

त्यौहार का समय फिर से आया। हल्दी-कुमकुम का त्यौहार आया, सुहागिनों ने श्रृंगार किया, गजरा सजाया, माथे पर बिंदी लगाई, हरि-हरी चूड़ियाँ पहनी, हाथों में मेहंदी लगी और गोटा वाली साड़ियाँ पहनीं। पर उस विधवा ने न तो चमकीली साड़ी पहनी, न ही टीका सजाया, और उसके हाथ भी खाली थे। एक बहन थी, जो पति की सताई हुई थी, वह दरिंदे को छोड़कर घर वापस चली आई। सगुना भी रह गई थी, बिन ब्याही, क्योंकि ग़रीब बाबा उसकी सगाई नहीं कर पाए थे।
उनके हाथों में मेहंदी नहीं थी, पांवों में पायल नहीं थी, चूड़ियों की खनक भी नहीं थी। वह सभी भावों से घायल थीं। उन्हें हल्दी-कुमकुम में जाने की मनाही थी। सब बेरंग, गुमसुम और मुरझाई हुई थीं। वेदना की बूँदें उनकी आँखों में समाई हुई थीं।। सभी को हर त्यौहार पर समान अधिकार मिले। तभी पुरुष प्रधान समाज में भी सभी नारियों का सम्मान होगा और रंग भरी क्यारियाँ सुरभित होंगी।

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अजब-गजब के रिश्ते

मैंने कई रिश्तों से गुज़रते हुए बहुत कुछ देखा है। मैंने उन लोगों को देखा जो दिल और जान से मरने वाले थे, पर उनके ही सीने में खंजर उतरते थे। जो लोग महफ़िलों में सीना चौड़ा करके सामने आते थे, उन्हें पीठ में वार करते देखा है। रात भर चादर की सिलवटों को और सुबह उसी चादर को सीधा होते भी देखा है। मैंने उन लोगों को भी देखा जो ताउम्र जख्म देते रहे, और फिर उनके कंधों पर सिर रखकर रोते थे। जिंदगी में बहारों का मौसम लेकर आने वाले लोगों को अक्सर ऐसे लोगों को विरानियों में बदलते हुए देखा है।

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शान-ए-कानपुर और कानपुर रत्न सम्मान समारोह

कानपुर के हरिहरनाथ शास्त्री भवन में शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह के 118वें जन्मोत्सव के अवसर पर एक भव्य समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर शान-ए-कानपुर सम्मान और कानपुर रत्न सम्मान प्रदान किए गए। मुख्य अतिथि श्री किरणजीत सिंह सरदार (भगत सिंह के भतीजे) ने शहीद भगत सिंह के अद्वितीय बलिदान और क्रांतिकारी विचारों को उजागर किया और युवा पीढ़ी को उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों — साहित्य, कला, शिक्षा, मनोरंजन, चिकित्सा, खेल, समाज सेवा — के लोगों को सम्मानित किया गया। उपस्थित जनों ने शहीदों के सपनों के भारत निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प लिया। गोल्डन क्लब ने रक्तदान, अंगदान और देहदान जैसे सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की मुहिम जारी रखने की घोषणा की।

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संगीत सूर्य केशवराव भोसले का 105वाँ स्मृति दिवस मनाया गया

मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक परिषद द्वारा संगीत सूर्य केशवराव भोसले के 105वें स्मृति दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुख्य अतिथि, लघु कथाकार और समीक्षक श्री संतोष सूपेकरजी ने छात्राओं को भोसले जी की अविस्मरणीय नाट्य परंपरा से परिचित कराते हुए युवा पीढ़ी को सांस्कृतिक क्षेत्र में योगदान देने के लिए प्रेरित किया। भोसले जी मराठी संगीत नाटक के सुप्रतिष्ठित कलाकार थे, जिन्होंने कम उम्र में नाट्य जगत में प्रवेश किया, नारी पात्रों की भूमिका निभाई और अनेक महत्वपूर्ण प्रयोगों से मराठी रंगभूमि के संगीत नाटक के सुवर्णकाल को पुनर्जीवित किया। उनके योगदान ने नाट्य, संगीत और सिनेमा में अमूल्य छाप छोड़ी। छात्राओं द्वारा प्रस्तुत रंगारंग कार्यक्रम और संस्था की प्रमुखों के उद्बोधन ने इस स्मृति दिवस को यादगार बनाया।

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

श्रीराम को केवल एक राजा या नायक के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श और जीवन-दर्शन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जिनमें मन रमा रहे, जिन्हें हमने कभी गुना नहीं, जो समय के शिलालेख पर पावन धाम हैं — वही राम हैं। उनकी मर्यादित कर्त्तव्य-बोध और कूटनीति की सूक्ष्म समझ, जीवन के रण में उनकी जीत और हार, सागर पर उनका साहस, प्रेम और त्याग — सब उन्हें न केवल नायक बल्कि नयनाभिराम बनाते हैं। उनके कार्य और आचरण हमारे जीवन में संजीवनी और अनमोल निधि की तरह हैं।

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प्रेम में पहाड़ होना

प्रेम केवल सहज अनुभव नहीं, बल्कि वह पहाड़ की तरह दृढ़ और विशाल भी हो सकता है। यह मन की गहराई से उत्पन्न होता है, तब जब शब्द भी लवों पर आने में संकोच करते हैं। प्रेम में केवल नदी या सागर की तरंगें नहीं, बल्कि वह इतनी शक्ति रखता है कि व्यक्ति पहाड़ बन जाए। यह केवल प्रेमी और प्रेमिका का रिश्ता नहीं है, बल्कि वह पीड़ा को भी अपने साथ बहा ले जाता है, सूर्य के ताप, चाँद की शीतलता, ऋषियों की तपस्या और हवन की अग्नि की तरह विस्तृत और बलिदानी होता है। प्रेम, त्याग और शिव के तांडव की भांति, कभी शांत, कभी उग्र — लेकिन हमेशा अमर और अडिग है।

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संदूक भर जीवन

घर के पिछले कमरे में रखा वह पुराना संदूक अब एक वस्तु नहीं रहा, वह मानो माँ के जीवन की पूरी कथा समेटे बैठा है। उसमें मायके की यादें हैं, विवाह की रस्मों के निशान हैं, और मातृत्व के पहले क्षणों की सोंधी गंध अब भी बसी है। हर वस्तु, हर दस्तावेज़ किसी बीते समय की गवाही देता है — मनीऑर्डर का पन्ना, साइकिल की रसीद, गाँव का ढहता इतिहास।
माँ के झुर्रियों वाले हाथ जब उसे छूते हैं, तो उनमें फिर वही स्फूर्ति लौट आती है, जैसे वर्षों पीछे लौट गई हों। और मैं, उस संदूक को निहारते हुए, महसूस करती हूँ कि उसमें सिर्फ़ माँ का ही नहीं, मेरा भी जीवन धीरे-धीरे सिमट आया है — तस्वीरों, कपड़ों और दस्तावेज़ों के रूप में। यही तो है “संदूक भर जीवन।”

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क्या करूँ

उस रात देर तक खिड़की के पास बैठी रही। सामने मेज़ पर रखा एक ख़त बार-बार उसकी नज़र खींचता, पर वह उसे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। बाहर चाँदनी का उजाला कमरे में फैल गया था — उतना ही शांत और अकेला, जितना उसका मन। आईने में बार-बार खुद को निहारते हुए उसे महसूस हुआ कि वह सिर्फ़ अपने आप से बातें कर रही है। वह सोचती रही — जब मिलने नहीं आते, तो इस फ़ुर्सत का क्या करे? जब बिछड़ने का डर हर पल सताता है, तो इस दहशत का क्या करे? शायद यही मोहब्बत की लत है, जो छोड़ने से भी नहीं छूटती। और आखिर में, जब दोस्त कहते हैं “सब्र रख, गायत्री”, तो वह बस मुस्कुरा देती है — क्योंकि सब्र भी अब उसी की तरह थक चुका है।

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नवल चाँद

शरद पूर्णिमा की वह रात सचमुच अद्भुत थी। आकाश में श्वेत रंग का धवल, नवल चाँद अपने पूरे तेज और सौंदर्य के साथ चमक रहा था। रात्रि अपने चरम पर थी, और उसी चरम पर वह पूर्ण चाँद था—निर्मल, चंचल, अद्भुत। ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं नवजीवन का स्वागत कर रही हो। वातावरण में एक अनकही शांति थी, जो भीतर तक उतर जाती थी। हर कोई जैसे प्रभु के चरणों में ध्यानमग्न था, उस दिव्यता में खोया हुआ। सचमुच, उस रात का वह चाँद ईश्वर का वरदान था—श्वेत वर्ण का, नवल और परम सुंदर चाँद।

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गंध अतीत की

अरसे बाद जब मैंने अपनी यादों से भरी डायरी खोली, तो एक अजीब-सी गंध ने मुझे घेर लिया — जैसे बीते हुए दिनों की धूल ने अचानक साँसों में जगह बना ली हो। हर पन्ना, हर शब्द, किसी पुराने खंडहर की दीवार-सा झरता हुआ लगा। मैं उन पलों को छूना नहीं चाहती थी, फिर भी वे मुझे अपने भीतर समेटने लगे। अतीत का हर कोना एक कहानी था — अधूरी, चुभती हुई, फिर भी ज़िंदा।

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