
खाटू एक नाम, एक स्थान नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की धड़कन है. राजस्थान के सीकर जिले में बसा यह गांव हर वर्ष उन भक्तों का साक्षी बनता है जो अपने जीवन के दुख-दर्द लेकर बाबा श्याम के दरबार में आते हैं और लौटते हैं तो मन में संतोष, आंखों में श्रद्धा और होठों पर केवल एक ही नाम-श्याम..श्याम.. श्याम..
खाटू श्याम बाबा का वास्तविक नाम बर्बरीक था. महाभारत के समय घटोत्कच और भीम के इस पराक्रमी पौत्र ने अपने अद्वितीय बलिदान से वह स्थान पाया जो देवताओं को भी दुर्लभ होता है. जब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे युद्ध में भाग न लेने का आग्रह किया तो बर्बरीक ने बिना एक क्षण भी विचारे अपना शीश उनके चरणों में समर्पित कर दिया. और तभी से वह केवल एक योद्धा नहीं, प्रेम और समर्पण की प्रतिमा बन गए. श्रीकृष्ण ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि कलियुग में वह श्याम के नाम से पूजे जाएंगे और उनका दरबार हर हारे हुए का सहारा बनेगा. तभी से वह शीशदानी कहलाए, और तभी से उनके नाम में वह शक्ति समा गई कि जो एक बार उन्हें सच्चे दिल से पुकार ले, वह कभी अकेला नहीं रहता.
कलियुग में जहां मनुष्य विश्वास खोता जा रहा है, संबंध छूटते जा रहे हैं, आत्माएं व्याकुल हैं वहीं खाटू श्याम का नाम आश्रय बनकर उभरता है. कोई जाति नहीं, कोई वर्ग नहीं, कोई भेदभाव नहीं बाबा का दरबार हर किसी के लिए खुला है. अमीर हो या गरीब, दुखी हो या निराश, सबके लिए एक ही शब्द है ङ्गङ्घभक्तफफ. और बाबा के लिए एक ही उत्तर-श्रद्धा से जो भी मांगा, मिलेगा ज़रूर.
इन भावों का चरम रूप देखने को मिलता है निर्जला एकादशी और द्वादशी के अवसर पर. निर्जला एकादशी, व्रतों में सबसे कठिन और पुण्यकारी, भीमसेन से जुड़ी हुई वह तिथि है जब बिना अन्न-जल के भक्त उपवास रखते हैं. यह केवल शरीर की परीक्षा नहीं, आत्मा की साधना है. जल न पीना केवल तप नहीं, अपने भीतर के संकल्प को बाहर लाने की प्रक्रिया है. भक्त दिनभर बाबा के चरणों में ध्यान लगाते हैं, भजन गाते हैं, और उस मौन में भी प्रार्थना करते हैं जिसे केवल श्याम बाबा सुन सकते हैं. आंखें पथराई होती हैं, होंठ सूखे होते हैं, पर मन में एक ही भाव ङ्गङ्घहे बाबा, इस बार सुन लो, मेरी पीड़ा हर लो.

दूसरे दिन द्वादशी आती है, जो समर्पण का प्रतीक है. कहते हैं इसी दिन बाबा ने श्रीकृष्ण को अपना शीश अर्पित किया था. इस दिन खाटू नगरी अलौकिक हो जाती है. मंदिर विशेष ृंगार से सजाया जाता है, भोग की थालियाँ अर्पित होती हैं, और भक्तों की कतारें सूर्योदय से पहले ही लग जाती हैं. कहीं संकीर्तन हो रहा होता है, कहीं बाबा की पालकी निकलती है, कहीं कोई बालक आंखें बंद करके मन ही मन कहता है-श्याम बाबा, मेरे पापा ठीक हो जाएं.फफ और वहीं एक वृद्ध माँ फूट-फूटकर रोती है बाबा, इस बार नकारना मत.
इन दोनों दिनों में खाटू एक गांव नहीं, भक्तिरस की गंगा बन जाता है. हर घर से शंखध्वनि सुनाई देती है, हर द्वार पर दीपक जलता है. जो नहीं आ सकते, वो भी घर बैठे मोबाइल या टीवी पर बाबा के दर्शन करते हैं. सोशल मीडिया पर लाइव कीर्तन चलते हैं, और लाखों दिल एक साथ धड़कते हैं श्याम के लिए.
और यही तो उनकी सबसे बड़ी महिमा है वो सीमाओं में नहीं बंधते. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, जयपुर ही नहीं, अमेरिका, कनाडा, दुबई तक उनका दरबार सजा है. जहां-जहां भक्त हैं, वहां-वहां बाबा हैं. यह कोई चमत्कार नहीं, यह आस्था की ताकत है. यह उस प्रेम की पुकार है जो श्याम के नाम पर टूट कर बरसती है.
आज के दिन अगर आपने भी एक बार दिल से श्याम बाबा का नाम लिया है, तो समझ लीजिए, आपने एक कदम उस राह पर रख दिया है जहां से कभी खाली नहीं लौटा जाता. वह राह जहां हार भी बाबा की शरण में जाकर जीत बन जाती है. वह राह जहां हर सवाल का जवाब बाबा की मुस्कान में छिपा होता है. और वह राह जहां थके हुए दिलों को नया हौसला मिलता है…क्योंकि श्याम है ना.
जय श्री श्याम. शीश दान करने वाले उस प्रेममूर्ति को बारंबार नमन.

सौ. सीमा सचिन जोशी
अध्यक्ष: विश्व ब्राह्मण समाज संघ, पुणे जिला
उपाध्यक्ष: पारीक समाज महिला मंडल, पुणे

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– सुरेश परिहार