Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

नन्हीं डलिया में बताशे

यह कविता बीते दौर की उस मासूमियत और सामाजिक गर्मजोशी को याद करती है, जो अब आधुनिक जीवन की भागदौड़ में खो गई है। कभी गलियों में बच्चों की डुगडुगी, उपवनों में शर्माती कलियाँ, और दोस्तों का एक पुकार पर दौड़ आना — ये सब अब दुर्लभ हो गए हैं। कवि ने भावपूर्ण शब्दों में यह अहसास जताया है कि समय के साथ रिश्तों, संवेदनाओं और सादगी की वो चमक अब धुंधला चुकी है।

Read More

जय मां गंगा

“गंगा उदास है… मेरी गंगा उदास है।”
भगीरथ की तपस्या से धरती पर उतरी माँ गंगा आज मनुष्य के कर्मों से मलीन हो उठी है। कभी संतों के चरणों में बहकर जग का संताप हरने वाली मंदाकिनी, आज प्रदूषण और उपेक्षा से व्यथित है। अपनी ही संतान के हाथों अपवित्र होती इस पावन धारा का मौन करुण क्रंदन — हमारी संवेदनहीनता का प्रमाण बन गया है।यह कविता केवल गंगा की वेदना नहीं, बल्कि उस सभ्यता का विलाप है, जिसने अपनी ही संस्कृति के प्रतीक को आघात पहुँचाया है।

Read More

समय की तरह पुरुष…

औरतें अपने पुरुषों के समय का बहुत ख्याल रखती हैं। लेकिन अगर सच में ख्याल रखना है, तो जरा ‘समय’ नामक पुरुष का पीछा करके देखो—आखिर यह समय कहाँ जा रहा है? क्या तुम इसे रोक पाओगी, अपनी जुल्फों में, या कोमल त्वचा पर, या आंखों की चमक और घुटनों की ताकत पर? नहीं, रोक नहीं पाओगी।तो फिर क्यों उलझती हो पुरुष के साथ? समय की तरह ही पुरुष भी है—तेरा है तो रहेगा, नहीं है तो चला जाएगा।

Read More

शहर के प्रसिद्ध बिजनेसमैन अजीत बोथरा को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं

जन्मदिन की शुभकामनाएँ! छात्र से सफल बिजनेसमैन तक का आपका सफर प्रेरणादायक है। आपकी मेहनत और लगन हमेशा नई ऊँचाइयाँ छुए। खुशियाँ, सफलता और स्वास्थ्य आपके जीवन में हमेशा बनी रहें!”

Read More

इसी तरह सोचो

यह कविता जीवन और संघर्ष की कठिनाइयों में महिलाओं को आत्मनिर्भर और साहसी बनने का संदेश देती है। कविता में बताया गया है कि जैसे लोहा आग में पिघलकर भी अपनी ताकत नहीं खोता, वैसे ही महिलाओं को भी कठिन परिस्थितियों में अपने साहस और आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। ‘बिटिया’ के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि जीवन के जंगल में जिंदा रहने के लिए हिम्मत, धैर्य और साहस आवश्यक हैं।

Read More

महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर अत्याचार बढ़े

यह लेख भारतीय समाज में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और जनजाति समुदायों के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर केंद्रित है। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हुई है, जिसमें घरेलू हिंसा, दहेज हत्याएं, अपहरण, बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले प्रमुख हैं। बच्चों पर अत्याचारों में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है, और बुजुर्ग व जनजाति समुदाय भी सुरक्षित नहीं हैं। लेख में यह भी बताया गया है कि केवल कानून और पुलिस की तत्परता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में पुरुष प्रधान मानसिकता को बदलना और महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना अनिवार्य है। यह स्थिति संकेत देती है कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर व्यापक सुधार की आवश्यकता है।

Read More

ढूँढें माँ की छाँव

यह कविता गहन भावनाओं और स्मृतियों के माध्यम से माँ और बचपन की छाया की खोज को प्रस्तुत करती है। पहली कविता में माता की ममता और उनके बिना घर की खाली-खाली देहरी की पीड़ा व्यक्त की गई है, जबकि दूसरी कविता में बचपन की नॉस्टैल्जिया और पिता की यादें उजागर हैं। कवि ने मातृत्व, प्रेम और संवेदनशीलता के रसों के साथ भावनाओं की गहराई में जाकर वियोग, याद और आत्मचिंतन का दृश्य खींचा है।

Read More

रावण दहन

यह लेख रावण दहन की पौराणिक कथा को जीवंत और संवादात्मक अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि रावण केवल एक राक्षस नहीं बल्कि विद्वान और शिवभक्त था, पर अहंकार और लालच के कारण उसका संहार निश्चित था। लंका युद्ध के समय देवी दुर्गा की पूजा और हनुमानजी की चतुरता से रावण का यज्ञ विफल हुआ और उसका संहार सुनिश्चित हुआ। इस कथा के माध्यम से विजया दशमी केवल पुतला जलाने का उत्सव नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक बन जाती है।

Read More

रावण का कद बढ़ रहा है ?

यह लेख दशहरे के प्रतीक रावण के पुतले को मात्र लकड़ी और कागज़ का नहीं बल्कि समाज में बढ़ते अहंकार, लालच, क्रोध और दिखावे का प्रतीक बताता है। जैसे-जैसे पुतले का कद हर साल बढ़ता है, वैसा ही हमारे विचारों और आचरण में भी बुराई का आकार बढ़ रहा है। असली विजयादशमी तब होगी जब हम केवल पुतले जलाने तक सीमित न रहकर अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और क्रोध को जलाएँ, दूसरों की सफलता से प्रेरणा लें और सादगी, सत्य और नैतिकता को जीवन का आधार बनाएँ। लेख समाज में व्याप्त बुराई और दिखावे के प्रति चेतावनी देते हुए पाठकों को आत्मचिंतन और सकारात्मक परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है।

Read More

प्रेमपत्र से वंचित लेखक

यह लेख एक हास्य-व्यंग्य शैली में लिखा गया आत्मकथन है, जिसमें लेखक अपनी असफलता का कारण मज़ाकिया अंदाज़ में पत्नी को ठहराते हैं। वह बताते हैं कि जवानी में यदि पत्नी ने उनके प्रस्ताव पर तुरंत “हाँ” न कहा होता, तो उनके भीतर “दिल टूट रस”, “बेचारा रस” और “मजनूं रस” उमड़ते और वे शायरी, कविताएँ व लेखों के माध्यम से एक बड़े लेखक बन जाते। मगर पत्नी ने उन्हें प्रेम-पत्र लिखने या भावुक कविताओं में ढलने का कोई अवसर ही नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि लेखक के भीतर मौजूद सारे “रस” वातावरण के अभाव में बाहर ही नहीं निकल पाए। लेख हल्के-फुल्के हास्य, नोकझोंक और आत्मव्यंग्य के माध्यम से यह संदेश देता है कि जीवन की दिशा और रचनात्मकता अक्सर निजी परिस्थितियों और रिश्तों से प्रभावित होती है।

Read More