“गोल्ड मेडल, ट्रेन और एक नीली जर्सी”

नागपुर रेलवे स्टेशन पर चलती ट्रेन में चढ़ती एक महिला फेंसिंग खिलाड़ी को बचाता नीली जर्सी पहने खिलाड़ी का भावनात्मक दृश्य।

सीमा “मधुरिमा” लखनऊ

नागपुर की वो शाम, जब मौत प्लेटफॉर्म पर खड़ी मेरा इंतज़ार कर रही थी..

तस्वीर कल एल्बम में मिली।

मैं, हाथ में साबरे का गोल्ड मेडल, और बगल में नीली जर्सी में वो लड़का—राजेश।

हमारी टीम का नहीं था, नागपुर का था। सिल्वर मेडल उसने जीता था… हमारी ही टीम के एक खिलाड़ी को हराकर।

अर्शी को फोटो दिखाते हुए अचानक सब याद आ गया।

“अर्शी, ये लड़का न होता, तो शायद मैं आज ज़िंदा न होती।”

नागपुर। फेंसिंग नेशनल।

मैच खत्म, गोल्ड गले में, और हम सब चाट-बताशे में बिज़ी।

जब तक स्टेशन पहुँचे, ट्रेन रेंगने लगी थी।

लड़कों ने सबको चढ़ाया। मैं हमेशा की तरह पीछे हट गई—पहले दूसरों को, फिर खुद को।

गलती की थी।

2013 में फ्लाइट में सीखा—”पहले अपना ऑक्सीजन मास्क, फिर बच्चे का।”

पर उस दिन तक ये सबक मिला नहीं था।

ट्रेन की रफ्तार बढ़ गई।

मैं चढ़ी, पैर फिसला… और एक सेकंड में पूरी ज़िंदगी आँखों के सामने घूम गई।

सुन्न।

साँस बंद।

मौत ने कंधा छू लिया था।

तभी नीचे से एक पैर आया।

राजेश का।

उसने मुझे हवा में थाम लिया। दूसरे दो-तीन लड़कों ने खींचकर ऊपर चढ़ाया।

नीली जर्सी वाला वो ‘विपक्षी’ टीम का लड़का, उस दिन फ़रिश्ता बन गया।

कोच यूनुस सर की जान में जान आई। बोले

“क्या सीमा, आज जीने का मन नहीं था?

सोचा, गोल्ड जीत लिया, अब ऊपर वाले को भी मेडल दिखा आएँ?”

पूरी बोगी हँस पड़ी।

मैं दो घंटे तक शून्य में थी।

यूनुस खान सर और आबिद खान सर हमारे कोच थे।

हुसैनगंज और नजीराबाद।

35 साल हो गए… कोई खबर नहीं।

अगर कोई जानता हो तो बताना, प्लीज़।

उन्होंने हमें ‘लड़की’ नहीं, ‘खिलाड़ी’ बनाकर रखा।

टीम में कभी ‘जेंडर’ नहीं आया, सिर्फ ‘गेम’ आया।

हम सभी लड़कियों की प्रैक्टिस लड़कों के साथ कराई जाती थी, ताकि हाथों में और शक्ति आए। और बेचारे लड़के… जिन्हें खुद लड़कों के साथ प्रैक्टिस करनी चाहिए थी, वे हमें शक्तिशाली बनाने के लिए जूझते रहते थे।

लेकिन हाँ, खेल से कहीं ज़्यादा अच्छा होता था प्रैक्टिस सेशन।

कॉलेज के बाद के.डी. सिंह बाबू स्टेडियम में रोज़ के दो घंटे…

वे तीन-चार साल हमारे जीवन से कभी निकल ही नहीं सकते।

हम कितना बचपना करते थे, कितनी मस्ती करते थे।

सभी के भीतर कितनी मासूमियत थी।

आज देखते हैं, छोटे-छोटे बच्चे भी अपनी मासूमियत कहीं खो चुके हैं।

हाँ, तो मैं बता रही थी कि हमारे बीच कहीं भी किसी प्रकार का कोई भेद नहीं था।

न हमारे मन में यह विचार आया कि हम लड़कियाँ हैं, इसलिए हमें शर्माना चाहिए… या लड़कों से अलग रहना चाहिए… या यह सोचना चाहिए कि लड़के हमें किस नज़र से देख रहे हैं।

सच तो यह है कि हमें कभी ऐसा महसूस ही नहीं कराया गया, इसलिए ऐसा कोई विचार मन में विकसित ही नहीं हुआ।

काश, हर लड़की की परवरिश इसी तरह हो।

हर लड़की को ऐसे ही कोच मिलें, जैसे हमें मिले थे।

हाँ, एक बार गोरखपुर टूर में…

मैंने अपने कोच से परमिशन ले ली थी। दिनभर गेम में रहती और शाम को अपनी दीदी (मामा की बेटी उषा दीदी) के घर रुक जाती थी।

ममेरे भाई लेने आते थे।

एक दिन रिक्शे पर जाते समय एक भैया ने दूसरे से बहुत धीमी आवाज़ में फुसफुसाकर कहा—

“टीचर लोग लड़कियों को पटा के रखते होंगे…”

छी…

बात कान में पड़ी और दिल में धँस गई।

अपने ही भाई…

इसी समाज के पुरुष हैं।

उनकी सोच समाज से अलग कैसे होगी?

उस दिन के बाद मैंने टीम को गौर से देखा।

कुछ नहीं था।

बिल्कुल कुछ नहीं।

नजीराबाद का ‘काके’ टीम में था।

वह रेनू को पसंद करता था।

पर मजाल है, जो कभी बोला हो।

बस नज़रें बता देती थीं।

यही तमीज़ यूनुस सर और आबिद सर ने सिखाई थी।

आज 35 साल बाद सोचती हूँ…

मदद पहले अपनी करो।

ज़िंदा रहोगे, तभी किसी और को बचा पाओगे।

विपक्षी टीम में भी फ़रिश्ते होते हैं।

जर्सी का रंग नहीं, इंसान का दिल देखो।

अच्छे कोच ‘गेम’ नहीं, ‘इंसान’ बनाते हैं।

राजेश,

अगर ये पोस्ट तुम तक पहुँचे… तो थैंक यू, दोस्त।

तुम्हारी तत्परता ने मेरी पूरी ज़िंदगी बचा ली।

गोल्ड मेडल तो मैंने जीता था,

पर ज़िंदगी का मेडल तुमने मुझे दिया।

यूनुस सर, आबिद सर,

आप कहाँ हो?

आपकी ‘सीमा’ आज भी आपको ढूँढ़ती है।

अर्शी कहती है

“तू हर बार दूसरों को पहले चढ़ाती है।”

मैं हँस देती हूँ

“आदत है।

पर अब ट्रेन पकड़नी हो, तो पहले खुद चढ़ती हूँ…

क्योंकि राजेश हर स्टेशन पर नहीं मिलता।”

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