नागपुर रेलवे स्टेशन पर चलती ट्रेन में चढ़ती एक महिला फेंसिंग खिलाड़ी को बचाता नीली जर्सी पहने खिलाड़ी का भावनात्मक दृश्य।

“गोल्ड मेडल, ट्रेन और एक नीली जर्सी”

गोल्ड मेडल जीतने की खुशी पलभर में मौत के साए में बदल गई। नागपुर स्टेशन पर चलती ट्रेन में चढ़ते समय एक विपक्षी खिलाड़ी ने अपनी तत्परता से मेरी जान बचा ली। यह संस्मरण केवल खेल की नहीं, बल्कि इंसानियत, सच्चे कोच और जीवन के अनमोल सबक की कहानी है।

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बठिंडा की काली राख से ढकी बस्ती में रहने वाले एक गरीब परिवार

काली राख की बस्ती

यह मार्मिक कथा बठिंडा की काली राख से ढकी बस्ती में रहने वाले एक गरीब परिवार की है, जिसकी जिंदगी एक दर्दनाक घटना के बाद हमेशा के लिए बदल गई। गरीबी, मजबूरी और समाज की कठोर सच्चाइयों को उजागर करती यह कहानी दिल को झकझोर देती है।

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रेडियो स्टेशन पर खामोश होते लम्हे

दौर के विविध भारती स्टेशन पर ‘हमारे मेहमान’ कार्यक्रम के लिए रिकॉर्डिंग तो सिर्फ आधे घंटे चली, लेकिन जब फांसी की पुरानी घटना का जिक्र हुआ, तो माहौल एकदम बदल गया। एनाउंसर सुधा शर्मा जी गीत के बीच अचानक मौन हो गईं — “रहे ना रहे हम, महका करेंगे…” गीत की पंक्तियाँ जैसे कमरे की संवेदना में घुल गईं।
जब मैंने 1996 में उज्जैन सेंट्रल जेल में देखी गई फांसी की घटना सुनानी शुरू की, तो सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे रुमाल से आँखें पोंछतीं, लंबी साँस भरतीं और कहतीं, “हां भाई साब, आगे बताइए…”
उनका हर सवाल—“सच में देखा?”, “डर नहीं लगा?”, “नींद आ गई थी उस रात?”—एक गहरी संवेदना और जिज्ञासा से भरा था। इंटरव्यू से ज़्यादा वक्त उस घटना की परतें खोलते हुए बीता।

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