बचपन की यादों और गांव की संस्कृति की भावुक कहानी

सन् 1976. बस ढचक-ढचक करके कच्ची सड़क पर मेरे गांव रामगढ़ की तरफ बढ़ रही थी. यह कच्ची सड़क पांच किलोमीटर की थी. छोटा भाई जैसे ही बस थोड़ी टेढ़ी होती, चिल्लाने लगता, “बस रोको, मुझे यहीं उतारो.” बस की सवारियां उसके चिल्लाने पर खूब हंसतीं और मुझे और मेरी बड़ी बहन को उसके चिल्लाने पर बहुत शर्म आती. डर हमें भी लगता था, लेकिन हम चिल्लाते नहीं थे.
गांव पास आता और पता नहीं कब अम्मां का उल्टा पल्ला सीधे पल्ले में बदलकर हल्के घूंघट का रूप ले लेता. किसी तरह बस गांव पहुंचती, तब जाकर जान में जान आती. गांव के बाहर चाचा-भाई सब हमारा इंतजार कर रहे होते. वे लोग हमारा सामान पकड़कर चलते. अम्मां उन लोगों के साथ धीरे-धीरे चलतीं, लेकिन मुझे तो गांव पहुंचते ही पंख लग जाते और तेजी से गांव के अंदर जाने के लिए ऊंचाई पर चढ़ने की दौड़ लगा देती. पूरा गांव करीब बारह फीट ऊंचे टीले पर बसा था.
काफी ऊंचाई पर बसे मेरे गांव में बाढ़ का खतरा कभी नहीं रहा. गांव के बाहर जो नदी थी, वह हमारी थी. उसमें चाचा-ताऊ लोग मछली और सिंघाड़े की पैदावार करते थे. इस नदी को मैंने कितनी बार अपनी बड़ी बहनों का हाथ पकड़कर पार किया है. बरसात के मौसम को छोड़कर इसमें तीन या चार फीट पानी ही रहता था.
मैं दौड़ती हुई चिल्लाती जाती, “हम लोग आ गए हैं.” रास्ते में चूड़ीहारिन का घर पड़ता. उसको कल के लिए आने का न्योता दे आगे बढ़ जाती. आगे भूंजे वाले को बोलती, “कल आऊंगी दाना भुजाने.” मुझे दाना खाने से ज्यादा भुजाने में मजा आता. आश्चर्य से चावल को लाई बनते देखना, मक्के को लावा होते देखना बहुत मजेदार लगता.
घर के दरवाजे पर पहुंचकर मुख्य द्वार की चौखट को पार करती. मैं छोटी थी, तो सिर नहीं झुकाना पड़ता था. अम्मां को सिर झुकाकर घुसना पड़ता था. मैं फिर चिल्लाती, “ये दरवाजा इतना छोटा क्यों है? सब दरवाजे तो इतने छोटे नहीं हैं?”
आंगन में चाची लोग पीतल की परात में पानी लेकर आतीं और हमारे पैर उस परात में डालकर धोतीं. तब तक अम्मां भी आ जातीं. उनके पैर भी धोए जाते, आखिरकार सबसे बड़ी जो थीं.
पैर धोने के बाद पैरों को हल्का-सा दबाकर गमछे से पोंछकर चाची कहतीं, “बिना कुछ खाए-पीए खेलेके नाहीं मिली.” जल्दी-जल्दी खाते और भागकर साथ में लाए हुए कपड़े और खिलौने अटैची से निकालकर अपने भाई-बहनों को देते. लेकिन सबसे ज्यादा खुशी होती आशा — मेरे बाबू के तीसरे नंबर के भाई की बेटी — को उसका सामान देने में.
हम भाई-बहन उसके सामने खड़े होकर पूछते, “आशा, हम कौन हैं?” खुशी का भाव उसके चेहरे पर होता और वह हमें पहचान जाती. उसकी आंखें बड़ी माता के प्रकोप से चली गई थीं. यह देखकर हम इतने खुश होते कि हमारी सारी थकान गायब हो जाती.
आशा की आंखों की रोशनी जाने के बाद अम्मां उसको लेकर बेल्लूर भी गईं, अपनी एक आंख आशा को देने के लिए. लेकिन आंखों की नसें सूख जाने के कारण यह महान कार्य पूरा न हो सका, जिसका अफसोस अम्मां को आजीवन रहा.
सुबह-सुबह उठकर हम सब रसोई — कच्ची बखरी कहते थे — के बगल में खाली जगह, जहां बर्तन धुलते, कपड़े धुलते और फैलते, वहीं एक बड़े नीम के पेड़ के नीचे जाकर बैठ जाते और ब्रश करते. लेकिन मेरी दीदी और बड़की अम्मां की बेटी हमेशा पेड़ पर चढ़कर नीम का दातून ही करतीं. मुझे उन्हें देखकर बहुत गुस्सा आता कि मैं पेड़ पर क्यों नहीं चढ़ पाती.
फिर बारी आती नाश्ते की. सब क्या खा रहे हैं, मुझसे कोई मतलब नहीं. मेरा तो पसंदीदा नाश्ता-खाना सब वही था — सत्तू, भरल मिर्चा (भरी लाल मिर्च का अचार) और प्याज.
छोटी चाची थोड़ा-थोड़ा देतीं और मैं रोती हुई कहती, “इत्ती सा?” चाची मेरे मुंह से ‘इत्ती सा’ सुनने के लिए ऐसा करती थीं. कहती थीं कि उनको मेरे मुंह से ‘इत्ती सा’ सुनना इतना अच्छा लगता था कि वह यह सुनने के लिए दसियों बार सत्तू तैयार करके मुझे दे सकती थीं.
नहा-धोकर हम सब रामशाला जाते — औघड़ बाबा किनाराम का आश्रम. हमारे गांव के ही तो थे बाबा किनाराम. आश्रम के बाहर बाबा किनाराम के हाथ से बनाया हुआ कुआं था. इसी कुएं में से बाबा किनाराम बनारस के रविंद्रपुरी स्थित ‘क्रीम कुंड’ में निकले.
इस कुएं में चार द्वार हैं और चारों द्वार से चार तरह का पानी आता है, जो अनेकों बीमारियों को दूर करता है. बड़ी मान्यता है इस कुएं की. आज भी हमारे गांव में किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहला निमंत्रण और भोजन बाबा को अर्पित होता है.
बाबा के आश्रम के रखवाले के रूप में विशालकाय हाथी आज भी याद है. मैं डरती हुई आश्रम में घुसती थी. गांव की सारी शादियों में दूल्हा उसी पर सवार होकर आता था और खूब पैसे लुटाए जाते थे. कोई भी मनौती पूरी होती तो आश्रम में ही भोज होता.
हम सबको बाबा पर प्रगाढ़ श्रद्धा है और विश्वास तो इतना कि बस बाबा का नाम लेते ही परेशानी का हल सामने होता है. हमारे लिए रामशाला किसी तीर्थ से कम नहीं है.
रामशाला जाते हुए रास्ते में पड़ता था पूरे जिले का सबसे बड़ा स्कूल — ‘बाबा किनाराम इंटर कॉलेज’. उस वक्त यहां मिड-डे मील मिलती थी. इतनी स्वादिष्ट होती थी, रोज अलग-अलग तरह का नाश्ता. हम उसको खाने स्कूल पहुंच जाते. बड़ी आवभगत होती हमारी. वाकई बड़े ठाठ थे हमारे.
गांव में रोज का नियम था. अंधेरा होने से पहले सारी लालटेनों के शीशे चमकाकर साफ होते और रोशनी के लिए बत्ती कर दी जाती. चाचा लोगों के बच्चे अपनी-अपनी स्लेट पर बैटरी की कालिख लगाकर, बोतल से रगड़कर खूब चमकाते. सरकंडे की कलम से इतनी सुंदर लिखावट लिखते कि हमें अपनी हैंडराइटिंग पर शर्म आती.
“चूड़ीहारिन आ गई… चूड़ीहारिन आ गई…” की आवाज सुन सब दालान में इकट्ठे हो जाते. अम्मां की तरफ से सबको चूड़ियां जो पहननी थीं.
सब अपनी-अपनी चूड़ियां पसंद करतीं और बारी-बारी से चूड़ीहारिन सबको पहनाती. उसका अंदाज ही निराला था. खूब बातें करती हुई हाथों को दबा-दबाकर एक साइज छोटी चूड़ी पहना देती.
मैं “पहले मुझे… पहले मुझे…” कह-कहकर चूड़ीहारिन की जान खा जाती और वह मुझसे अपनी जान बचाकर सबसे पहले मुझे चूड़ियां पहना देती.
चूड़ियां पहनकर चाची को वहां से खींचती हुई कहती, “चलो और मुझे कुछ सील पर पीसने के लिए दो.” खाली सिल-बट्टा चलाने की सख्त मनाही थी. चाची थोड़ा-सा खड़ा नमक सिल पर डाल देतीं और मैं चूड़ियों की छन-छन सुनने के लिए नमक को खूब पीसती. चाची मुझे देखकर खूब हंसतीं.
अब बारी आती खरीदारी की.
“चाची-चाची, जल्दी से अनाज दो, टॉफी खरीदना है.”
छोटी-सी दौरी (मूंज की बनी टोकरी) में चाची बाजरा या धान दे देतीं और उसको लेकर बनिए के यहां जा पहुंचती. वहां से जब मैं टॉफी — गांव में लेमनचूस बोलते थे — खरीदकर लौटती, उस वक्त इतनी खुश होती और सबसे कहती कि मैंने तो फ्री में टॉफी खरीदी है.
उस वक्त नहीं पता था कि अनाज कितना कीमती होता है.
हम किसी की शादी, त्योहार या किसी के बैकुंठ पधारने पर ही गांव आते. बाबू का मानना था कि त्योहारों पर अपनी संस्कृति को जानना और अपनों के साथ रहना जरूरी है.
दशहरे पर सब बड़ों के पैर छूते और आशीर्वाद के साथ मिलते पैसे. कोई एक रुपया देता, कोई दो रुपये. कुल मिलाकर बारह-पंद्रह रुपये इकट्ठे हो जाते.
सब भाई-बहनों के साथ मिलकर मेला देखने जिस रास्ते से जाते, उस रास्ते में बंसवारी पड़ती और बंसवारी के दूसरी तरफ बौली (छोटा-सा तालाब) थी. बौली के सामने काली माई का मंदिर था.
सब भाई-बहन हमें डराते और कहते, “बौली का पानी नहीं छूना, नहीं तो चुड़ैल पानी के अंदर खींच लेगी.” इस बात से मैं इतना डरती कि दशहरे के मेले में धमाचौकड़ी करते, खिलौने और चूड़ियां खरीदते, गोलगप्पे और टिक्की खाते वक्त भी बस यही सोचती कि अंधेरा होने से पहले बौली का रास्ता पार करके घर पहुंच जाऊं.
सबको “जल्दी चलो, जल्दी चलो” कह-कहकर परेशान कर डालती.
जितना भी खरीद लो, खा लो, लेकिन इतने ज्यादा होते थे वो पंद्रह रुपये कि खर्च ही नहीं होते थे. कुछ रुपये बच ही जाते थे.
वो दिन आज भी याद आते हैं…
काश, वो समय मैं फिर से जी पाती या उस समय में वापस जा पाती. सच कहती हूं, कभी भी वापस नहीं आती.

Kuchh yaaden bas yaaden reh jati hai……kuchh anmol yaaden
सच कहा प्रभात 😍
बहुत सुंदरता से वर्णन किया है।रोचक ।
सच कहा प्रभात 😍
आभार आर्यमा जी 🙏😍
Very expressive ❤️