गांधी-निंदा अभियानों को वैचारिक चुनौती : अशोक वाजपेयी

हेमा म्हस्के, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे की रिपोर्ट
नई दिल्ली।
प्रख्यात विचारक एवं लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल की बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘मजबूती का नाम महात्मा गांधी’ का लोकार्पण हाल ही में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक महात्मा गांधी को लेकर फैलाए जा रहे मिथकों और नकारात्मक अभियानों के बीच एक सशक्त वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है। समारोह में देशभर से आए लेखक, विचारक, बुद्धिजीवी और बड़ी संख्या में युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
संगीत से गांधीमय हुआ वातावरण
लगातार बारिश और ठंडी हवाओं के बावजूद सभागार खचाखच भरा रहा। कार्यक्रम की शुरुआत प्रसिद्ध गायिका शुभा मुद्गल की शिष्या शिवांगिनी द्वारा मीरा और कबीर के पदों के सुमधुर गायन से हुई। जब उन्होंने गांधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ को विशेष अंदाज़ में प्रस्तुत किया, तो पूरा सभागार गांधी के विचारों और संवेदनाओं से भर उठा।
राजमोहन गांधी की चिंता: देश में फैलाए जा रहे तीन झूठ
समारोह का प्रमुख आकर्षण महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी का ऑनलाइन संबोधन रहा। स्वास्थ्य कारणों से वे उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने अपने वक्तव्य में देश में बढ़ती हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य, दलितों और महिलाओं पर हो रहे हमलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज देश में तीन बड़े झूठ फैलाए जा रहे हैं. पहला, बड़ी संख्या में विदेशी मुसलमानों के भारत में प्रवेश का दावा; दूसरा, व्यापक स्तर पर धर्मांतरण की बात; और तीसरा, यह मिथक कि गांधी जी ने कभी देश विभाजन का विरोध नहीं किया। उन्होंने कहा कि ऐसे झूठ भारत की वसुधैव कुटुंबकम की पहचान को नुकसान पहुँचा रहे हैं और गांधी के संदेश डरो मत, डराओ मत, नफरत छोड़ो को अपनाने की आवश्यकता है।
गांधी निंदा अभियानों को सीधी चुनौती
प्रख्यात कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने अपने संबोधन में कहा कि यह पुस्तक मौजूदा समय में चल रहे गांधी-निंदा अभियानों के लिए एक सशक्त वैचारिक चुनौती है। उन्होंने कहा कि आज का समाज सोचने के बजाय केवल देखने का आदी होता जा रहा है, और ऐसे समय में गांधी पर गंभीर विचार की आवश्यकता और बढ़ जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रार्थना सभा के रूप में गांधी जी ने एक नए प्रकार के उपासना स्थल की रचना की थी। उनके इस कथन पर सभागार तालियों से गूंज उठा।
लेखक का वक्तव्य: गांधी मजबूरी नहीं, मजबूती हैं
पुस्तक के लेखक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि यह कृति उनकी वर्षों की वैचारिक यात्रा और बेचैनी का परिणाम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गांधी को ‘मजबूरी’ नहीं, बल्कि ‘मजबूती’ के रूप में देखने की उनकी समझ दशकों पहले विकसित हो चुकी थी। उन्होंने कहा कि गांधी की अहिंसा कायरता नहीं, बल्कि करुणा और संयम पर आधारित एक सचेत संकल्प है, जो हर परिस्थिति में मनुष्य के भविष्य को सुरक्षित रखता है।समारोह का संचालन राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी ने किया। उन्होंने कहा कि गांधी सत्य और नैतिक साहस की ऐसी मजबूती हैं, जिनसे भयभीत लोग ही उन्हें ‘मजबूरी’ कहने का प्रयास करते हैं।
