जहां इतिहास, कला और चेतना एक साथ आकार लेते हैं

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
जब आप खजुराहो की धरती पर कदम रखते हैं, तो यह केवल एक ऐतिहासिक स्थल की यात्रा नहीं होती, बल्कि भारतीय चिंतन, कला और आध्यात्म की गहराइयों में उतरने का अनुभव बन जाती है. मध्यकालीन चंदेल शासकों द्वारा निर्मित ये मंदिर आज भी समय को चुनौती देते हुए खड़े हैंमानो पत्थरों में सांस लेती हुई एक जीवंत सभ्यता.इतिहासकार बताते हैं कि ९५० से १०५० ईस्वी के बीच निर्मित इन मंदिरों में जीवन के चार पुरुषार्थधर्म, अर्थ, काम और मोक्षका अद्भुत संतुलन दिखाई देता है. यहां की मूर्तियां केवल श्रृंगार या काम का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन की संपूर्णता का उत्सव हैं्. दिलचस्प बात यह है कि जिन मूर्तियों को लेकर सबसे अधिक चर्चा होती है, वे कुल शिल्प का केवल एक छोटा सा हिस्सा हैं्. शेष भव्य प्रतिमाएं देवी-देवताओं, अप्सराओं, नृत्यांगनाओं और जनजीवन के विविध रूपों को दर्शाती हैं्.

आध्यात्मिक चिंतक ओशो रजनीश ने खजुराहो को काम और ध्यान के बीच सेतु बताया. उनके अनुसार मंदिर की बाहरी दीवारों पर अंकित काम दृश्य मनुष्य को अपनी वासनाओं से भागने नहीं, बल्कि उन्हें समझने और सजगता के साथ पार करने की प्रेरणा देते हैं. ओशो का मत था कि दमन नहीं, बल्कि जागरूकता ही मुक्ति का मार्ग हैऔर खजुराहो इसी संदेश का सजीव प्रतीक है.साहित्यकारों ने खजुराहो को भारतीय कला की पराकाष्ठा कहा है जहां पत्थर भी भावनाओं से भरे प्रतीत होते हैं्.
यहां की मूर्तियां स्थिर होकर भी गतिमान लगती हैं, मौन होकर भी संवाद करती हैं्. वे बताती हैं कि भारतीय संस्कृति में आध्यात्म और जीवन-आनंद परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो आयाम हैं.खजुराहो की यात्रा इसलिए विशेष है क्योंकि यहां इतिहास, दर्शन, कला और आध्यात्म एक साथ अनुभव होते हैं. जब सूर्य की किरणें मंदिरों की नक्काशी पर पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है मानो समय स्वयं ठहरकर इस सौंदर्य को निहार रहा हो.यदि आप केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि अनुभवकर्ता बनकर यात्रा करना चाहते हैंयदि आप भारतीय संस्कृति की गहराई को समझना चाहते हैंतो खजुराहो आपको आमंत्रित कर रहा है. यह केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि चेतना की यात्रा है.

खजुराहो मंदिर समूह का इतिहास-चंदेल वंश द्वारा ९५० से १०५० ईस्वी के बीच निर्मित खजुराहो स्मारक समूह आज यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में संरक्षित है. ये मंदिर नागर शैली की वास्तुकला और अप्सराओं, देवी-देवताओं तथा पौराणिक पात्रों की आकर्षक मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं्. इनकी कलाकृतियों में आध्यात्म, ध्यान, जीवन दर्शन और मानवीय संबंधों का सजीव चित्रण दिखाई देता है. उत्कृष्ट शिल्पकला और अद्भुत स्थापत्य कौशल खजुराहो को भारत के सबसे दर्शनीय पर्यटन स्थलों में स्थान दिलाता है.
खजुराहो में घूमने योग्य प्रमुख स्थल
खजुराहो के मंदिर तीन समूहों में विभाजित हैं-पश्चिमी समूह, पूर्वी समूह और दक्षिणी समूह
.पश्चिमी मंदिर समूह-यह समूह पुरातत्व संग्रहालय के निकट स्थित है और यहां लक्ष्मण, मतंगेश्वर, वराह, कंदारिया महादेव, चित्रगुप्त, पार्वती, विश्वनाथ और नंदी मंदिर प्रमुख हैं. इन मंदिरों की भीतरी और बाहरी दीवारों पर लगभग ८७० सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं. गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग और पुष्पाकृति नक्काशी विशेष आकर्षण का केंद्र हैं.
कंदारिया महादेव मंदिर-१०२५ से १०५० के बीच निर्मित यह मंदिर पर्वत श्रृंखला की भांति ऊंचे शिखरों में उठता है. इसके द्वार पर चार भुजाओं वाले शिव की प्रतिमा ब्रह्मा और विष्णु के साथ अंकित है.
जगदंबी मंदिर-देवी पार्वती को समर्पित इस मंदिर में विष्णु की सुंदर प्रतिमा स्थापित है. यहां की सुरासुंदरियों की मूर्तियां विशेष रूप से आकर्षक हैं.चित्रगुप्त मंदिर-यह मंदिर सूर्य देव को समर्पित है. यहां ग्यारह मुख और आठ भुजाओं वाले विष्णु की अद्भुत प्रतिमा भी देखी जा सकती है.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संग्रहालय-यहां ११वीं-१२वीं शताब्दी की जैन प्रतिमाएं, वराह की बहुमुखी मूर्ति और नृत्य करते गणेश की कलाकृतियां प्रदर्शित हैं्.

पूर्वी मंदिर समूह- वामन मंदिर-विष्णु के वामन अवतार को समर्पित यह मंदिर १०५० से १०७५ के बीच निर्मित हुआ्.जवारी मंदिर-१०७५ से ११०० के बीच बना यह मंदिर ऊंचे चबूतरे पर स्थित है और इसकी सुंदर तोरण नक्काशी अद्वितीय है.पार्श्वनाथ मंदिर-९५० से ९७० के बीच निर्मित यह जैन मंदिर मधुर रंग के बलुआ पत्थर से बना है और इसमें वैष्णव परंपरा की झलक भी मिलती है. इसके अतिरिक्त आदिनाथ, शांतिनाथ, घंटाई और ब्रह्मा मंदिर भी इस समूह के महत्वपूर्ण स्थल हैं्.
दक्षिणी मंदिर समूह- दुलदेव मंदिर-११०० से ११५० के बीच निर्मित यह मंदिर अपनी उड़ती हुई अप्सराओं और स्त्री आकृतियों के अलंकरण के लिए प्रसिद्ध है.
चतुर्भुज मंदिर-यह खजुराहो का एकमात्र मंदिर है जिसमें श्रृंगारिक मूर्तियां नहीं हैं्. यहां विष्णु की भव्य प्रतिमा दर्शनीय है.
खजुराहो के आसपास घूमने योग्य स्थान
आदिवर्त जनजातीय और लोक कला संग्रहालय-यह संग्रहालय मध्य प्रदेश की जनजातीय संस्कृति को दर्शाता है. यहां पारंपरिक घरों, कलाकृतियों और वाद्ययंत्रों का प्रदर्शन किया गया है.
पन्ना राष्ट्रीय उद्यान-खजुराहो से ९६ किलोमीटर दूर स्थित यह उद्यान विंध्य पर्वतमाला में फैला है. यहां बाघ, तेंदुआ, हिरण और अनेक पक्षी प्रजातियां देखी जा सकती हैं. जंगल सफारी रोमांचक अनुभव प्रदान करती है.
रनेह जलप्रपात-खजुराहो से २१ किलोमीटर दूर स्थित यह जलप्रपात ३० फुट गहरी घाटी बनाता है. धूप में इंद्रधनुष का दृश्य मनमोहक होता है.
पांडव जलप्रपात-खजुराहो से ३४ किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल केन नदी से निर्मित ३० मीटर ऊंचा जलप्रपात है. मान्यता है कि महाभारत काल की गुफाएं यहां स्थित हैं.
महाराजा छत्रसाल संग्रहालय-धुबेला झील के किनारे स्थित यह संग्रहालय ऐतिहासिक धरोहरों का संग्रह है.जैन संग्रहालय-यहां २४ तीर्थंकरों की सुंदर प्रतिमाएं और जैन संस्कृति से संबंधित अनेक वस्तुएं प्रदर्शित हैं.
खजुराहो नृत्य महोत्सव-फरवरी माह में आयोजित खजुराहो नृत्य महोत्सव कला और स्थापत्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है. देशभर के प्रसिद्ध कलाकार यहां शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत करते हैं, जो दर्शकों के लिए अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है.
खजुराहो कैसे पहुंचें
रेल मार्ग से-खजुराहो रेलवे स्टेशन नगर से लगभग ५ किलोमीटर दूर है. निकटतम प्रमुख स्टेशन महोबा है, जो ७८ किलोमीटर दूर स्थित है.
वायु मार्ग से-खजुराहो का घरेलू हवाई अड्डा मंदिरों से लगभग २ किलोमीटर दूर है. यहां से दिल्ली, मुंबई, भोपाल और वाराणसी के लिए उड़ानें उपलब्ध हैं.
सड़क मार्ग से-खजुराहो राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. झांसी सहित आसपास के शहरों से नियमित बस सेवाएं और निजी वाहन उपलब्ध हैं.खजुराहो केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, कला और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक है. यहां की यात्रा इतिहास, सौंदर्य और आध्यात्मिकता के अनोखे अनुभव से भर देती है.
