अगर मैं किसी सुबह न उठूँ…

जिस सुबह वह नहीं उठी, वह हार नहीं थी वह एक चुप विदाई थी।रोज़ के झगड़ों, टूटती उम्मीदों और खुद को खो देने की थकान का अंत। जिसे वह प्रेम समझती रही, वह पत्थर निकला, और जिसे वह बचाती रही, वही उसे तोड़ता रहा।

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स्वतंत्र कलम का हकदार होता है सच्चा पत्रकार

सोशल मीडिया के दौर में सच्ची और फर्जी खबरों के बीच का अंतर लगातार धुंधला होता जा रहा है। बिना प्रमाण-पत्र के स्वयं को पत्रकार बताकर कुछ लोग बेबुनियाद खबरें फैलाकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं, जिससे असली और जिम्मेदार पत्रकारिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जबकि सच्चा पत्रकार वही है जो निष्पक्षता, सत्य और सामाजिक दायित्व के साथ समाज और सरकार के बीच एक सेतु बनकर कार्य करता है।

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वह सुबहें, वह होटल, वह जूनून

महिदपुर रोड की शंकर सेठ की होटल, और वहाँ डम्प होने वाले अखबार। बचपन का वह लड़का, जो फिल्मों के पोस्टर और शो टाइम्स जानने के लिए हर दिन सुबह निकल पड़ता।
पहले डर और हिचकिचाहट के साथ, धीरे-धीरे वह परिचितों में ढल गया—रामनिवास मंडोवरा काकाजी, कालू दा, चंद्रकांत जोशी। अखबारों के पन्नों में डूबते हुए उसका जुनून बन गया आदत, और फिर लत।शंकर सेठ की होटल सिर्फ एक जगह नहीं थी. वह वह मंच थी जहाँ बचपन की जिज्ञासा और सपने पत्रकारिता की दुनिया में बदलने लगे

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जंगल में झरने के पास बैठे एक युवक और चट्टान पर खड़ी पहाड़ी महिला, दोनों के चेहरों पर गहरा दर्द और भावनात्मक जुड़ाव

पीर की नदी

बहुत देर तक जंगल में भटके कृष की थकान झरने की कल-कल में घुलने लगी। तभी चट्टान पर झुकी एक पहाड़ी औरत दिखी। उसकी आँखों की पीड़ा कृष को अपनी लग रही थी। वे दोनों अलग भाषाएँ बोलते थे, पर दर्द की भाषा एक थी। इशारों और टूटे शब्दों के बीच दोनों अपनी-अपनी चुप चीखें उँडेलते रहे। वह भार, जो दिलों पर चट्टान बना बैठा था, धीरे-धीरे पिघलता चला गया। उस पल उन्हें समझ आया कि पीर को भाषा नहीं चाहिए .वह तो गूंगी होती है, पर हर अंग से बोलती रहती है।

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बिना आत्मा के शरीर बेजान

मनुष्य पूरे जीवन उस चीज़ के पीछे भागता रहता है जिसे वह मृत्यु के बाद साथ ले ही नहीं जा सकता। न शरीर उसके साथ जाता है और न ही शौहरत साथ जाता है तो केवल कर्म, जिसकी ओर वह सबसे कम ध्यान देता है। आज अधिकांश लोग अपने सुख के लिए दूसरों के अरमान कुचलने में भी हिचकते नहीं, यही विकर्म उन्हें भीतर से अशांत कर देता है। सच यह है कि बिना आत्मा के शरीर सिर्फ एक बेजान ढांचा है, और बिना शरीर के आत्मा कर्म नहीं कर सकती। शव तभी शव कहलाता है जब आत्मा देह से विदा हो चुकी हो।

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हम गज़ल कहने लगे…

जब से लोग खून-खराबे को भी उत्सव का नाम देने लगे, तभी से पुराने घाव फिर से हरे होने लगे। शहर इतना खामोश हो गया है कि हादसों की आवाज़ भी नहीं उठती, क्योंकि यहाँ खुशनुमा चेहरों के बीच कलमें झुककर रह गई हैं। घुँघरुओं का दर्द अब नया नहीं लगता, क्योंकि बारूद से सजे कारवाँ चलने लगे हैं। इशारों की भाषा भी लोगों को समझ नहीं आती, दोस्ती के हाथ बेवजह कटने लगे हैं। सहमी हुई फिज़ाओं में रात भी ढलती नहीं, क्योंकि मोहब्बत के दिए तूफ़ानों से लड़ने लगे हैं। और यही कारण है कि ‘राकेश’ अब सियाह रातों में सर नहीं उठाता क्योंकि जंगें हारने के बाद लोग ग़ज़लें कहने पर मजबूर हो जाते हैं

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अनोखा प्यार

तूफ़ान मेल की छुक-छुक के बीच अचानक अर्जुन की नज़र एक जानी-पहचानी खुशबू पर ठहरी वह निशा थी। छह वर्षों का सन्नाटा पलभर में टूट गया। उम्र की सफेदी बालों में उतर आई थी, पर भावनाओं की गरमी अब भी वही थी। कॉलेज के दिनों का प्रेम, एक गलती से टूटा संबंध, और फिर ट्रेन में यूँ अनायास मिलना.दोनों के भीतर दबा हुआ प्यार फिर से जाग उठा। आधी रात की लंबी बातचीत के बाद अर्जुन ने हाथ बढ़ाया-“मेरे साथ उतरना चाहोगी?” निशा ने बिना झिझक अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया। पुराने ग़िले धुल गए थे; दो अकेली ज़िंदगियाँ फिर से एक-दूसरे को पा चुकी थीं।

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स्त्री

प्रेम में डूबी स्त्री कभी नादान-सी लगती है, कभी इतनी कोमल कि जैसे स्पर्श से बिखर जाए। उसके भीतर सपनों की हलचल है. उमड़ती-घुमड़ती, तितर-बितर होती तमन्नाएँ। वह तितली-सी है, जिसे उड़ना तो है, आसमान को छूना भी है, पर उसके चारों ओर फैली दुनिया उसे फूलों के दायरे से बाहर जाने ही नहीं देती। आसमान ऊँचा है, अपने ही गर्व में अडिग; और ज़मीन पर खड़ी वह स्त्री अपने पंख फैलाने को तैयार होते हुए भी उड़ नहीं पाती।

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नया दिन, नई आशा

सूरज की कोमल किरणों के साथ नया दिन, नई आशा और उमंग लेकर आता है। प्रकृति की हरियाली, कल-कल करती नदियाँ और चहकती चिड़ियाँ जीवन में प्रेरणा और ऊर्जा भरती हैं। साहस और मेहनत के साथ हर चुनौती को पार करना ही सफलता का मार्ग है।”

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“क्यों टूट रहे हैं रिश्ते?

“आधुनिक जीवन की भागदौड़, अहंकार, संवाद की कमी और संस्कारों से दूर होती नई पीढ़ी इन सबने विवाह जैसे पवित्र बंधन को कमजोर कर दिया है। परिवार का ताना-बाना बिखर रहा है, संयुक्त परिवार टूट चुके हैं और रिश्तों में धैर्य व समझदारी कम होती जा रही है। यही कारण है कि विवाह-विच्छेद बढ़ते जा रहे हैं।”

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