पलाश के सामने एक खिड़की

नगर-सीमान्त पर जहाँ मेरा बसेरा है, उसके ठीक सामने पलाश का एक पेड़ है… जब से उस पर पलाश के अंगारे खिले हैं, मन शरविद्ध हरिण की भाँति बार-बार वहीं चला जाता है। जैसे फूल रौशनी हों। और फूलों का न होना रात्रितिमिर, जिसमें पेड़ आँख से ओझल हो जाएं… वसंत से बड़ा निर्मोही कौन है?

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“इश्क़, एल्कोहल और ऑक्सीटोसिन

नब्बे का दशक इश्क़, संगीत और साइंस की जुगलबंदी का दौर था — जब रिकी मार्टिन दिलों पर राज कर रहे थे और वैज्ञानिक प्यार का फार्मूला गढ़ रहे थे। यह लेख उस मोहब्बती समय की एक संवेदनशील, हास्य-विनोद और आत्ममंथन से भरी झलक है।

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जब काली बिल्ली ने मेरा मन पढ़ लिया

“यह कहानी एक अकेले रहने वाले व्यक्ति और एक रहस्यमयी काली बिल्ली के बीच बनते एक अनोखे, गहरे और आत्मीय रिश्ते की है। कुछ दिनों का यह साथ न सिर्फ उसकी बिल्ली पालने की इच्छा पूरी करता है, बल्कि यह एहसास भी देता है कि कभी-कभी जानवर हमारे मन की बात हमसे पहले जान लेते हैं।”

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…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए

इस कविता में एक स्त्री अपने जीवन के उस मोड़ पर खड़ी होकर गुज़रे समय को फिर से जीने की ख्वाहिश करती है — वो अधूरे सपने, वो रिश्ते, वो बचपन की अलमारी, और माँ की बातें… सब कुछ एक बार फिर सहेजने की उम्मीद लिए। यह एक आत्ममंथन है, एक नई शुरुआत की ओर बढ़ने का भावुक आह्वान।”

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“यमराज की उलझन: अनुपम या अनुपमा?”

वो भैंसा बुरी तरह से थक चुका था , बुरी तरह से हांफ रहा था ! उसके नथुनों से भर्र भर्र की आवाज़ आ रही थी ! हालाकिं वह कोई ऐरागैरा भैंसा नहीं था , वह तो यमराज़ जी का भैंसा था ! एक तो ग्रीष्म काल की गर्मी , ऊपर से यमराज जी की…

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ग़ज़ल

प्यार से लबरेज़ दुनिया में कोई गर दिल न हो तब तो ये दुनिया भी शायद रहने के क़ाबिल न हो सूना सूना भूतिया सा मुझको लगता अपना घर जब तलक आँगन में कोई बच्चों की खिल खिल न हो बस चले जाना ही हर दिन आदमी का शग़्ल है कोई दिन उसका न होता…

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आंख मारने की कला

मैं उस शख़्स को शाष्टांग दण्डवत करता हूँ जिसने पहले पहल “आँख मारने ” की कला विकसित की ! ज़रा आप ही सोच कर देखिये कि इस छोटे से , सरल से “संकेत” से कितना बड़ा “संदेश” , पलक झपकते ही दूसरी ओर चला जाता है और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि…

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कालू कुत्ते की कहानी

  कालू का दर्द  

कालू नाम के कुत्ते की यह मार्मिक कहानी समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। एक हवेली के बाहर रहने वाला कालू जब एक मासूम बच्ची के साथ हुई निर्दयता देखता है, तो उसका मन व्यथित हो उठता है। उसकी मां मिल्की के शब्द इंसानों की दुनिया की कठोर सच्चाई को सामने लाते हैं जहां बच्चे भी भेदभाव का शिकार होते हैं। यह कहानी संवेदनाओं को झकझोरने वाली एक गहरी सामाजिक टिप्पणी है।

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सबसे बड़ा है कौन

सत्ता ,संगठन और राजनेता राजनीति की मुख्य धुरी हैं। कहा जाता है कि अगर इनमें तालमेल है तो सब कुछ ठीक नजर आता है मगर कभी कभी इनमें वर्चस्व की लड़ाई छिड़ जाती है और फिर यह तयः करना मुश्किल होता है कि इन तीनों में से कौन बड़ा है ,सर्वश्रेष्ठ है या किसकी चलती है या किसकी सुनी जा रही है। देखा जाए तो संगठन ही सबसे बड़ा होता है क्योंकि संगठन ही सबको जोड़कर रखता है और संगठन के नीचे ही सब काम करते हैं और संगठन ही निर्णय करता है कि कौन चुनाव लड़ेगा और जीतकर सत्ता में जायेगा और कौन संगठन में काम करेगा। संगठन ही तयः करता है कि कौन राजा बनेगा और कौन मंत्री । इसलिए संगठन और संगठन का मुखिया ही बड़ा होता है। संगठन से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले चारों खाने चित ही दिखाई दिए हैं।

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