
डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर
आँसुओं का हिसाब रखे ज़माना हुआ है,
जब से दर्द से मेरा याराना हुआ है।
हम दिलाते रहे यक़ीं अपनी मासूमियत का,
वो छोड़कर हमें किसी और का दीवाना हुआ है।
हम जलते रहे उसकी दीवानगी में शमा की तरह,
वह बाँधकर कफ़न, महबूब-ए-वतन का सरफ़रोश परवाना हुआ है।
ये कुर्सियों की लड़ाई बहुत पुरानी है, साहब,
सत्ता के नशे में ये मुल्क सारा मयखाना हुआ है।
जज़्बातों से खेलने वालों को कसूरवार भला ठहराएँ कैसे,
इश्क़ से खेलना नए ज़माने के चलन का पैमाना हुआ है।
छोड़ दिया है हमने अब उनके इल्ज़ामों पर सफ़ाई देना,
मिज़ाज जब से मेरा सूफ़ियाना हुआ है।
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बेहतरीन गजलें बहुत बहुत बधाई।
Thanks