आँसुओं का हिसाब रखे ज़माना हुआ…

डायरी पर लिखी हिंदी ग़ज़ल के पन्नों पर गिरते आँसू, रात की हल्की रोशनी में भावुक माहौल “दर्द जब सूफ़ियाना हो जाए, तो आँसू भी इबादत लगते हैं।”

डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

आँसुओं का हिसाब रखे ज़माना हुआ है,
जब से दर्द से मेरा याराना हुआ है।

हम दिलाते रहे यक़ीं अपनी मासूमियत का,
वो छोड़कर हमें किसी और का दीवाना हुआ है।

हम जलते रहे उसकी दीवानगी में शमा की तरह,
वह बाँधकर कफ़न, महबूब-ए-वतन का सरफ़रोश परवाना हुआ है।

ये कुर्सियों की लड़ाई बहुत पुरानी है, साहब,
सत्ता के नशे में ये मुल्क सारा मयखाना हुआ है।

जज़्बातों से खेलने वालों को कसूरवार भला ठहराएँ कैसे,
इश्क़ से खेलना नए ज़माने के चलन का पैमाना हुआ है।

छोड़ दिया है हमने अब उनके इल्ज़ामों पर सफ़ाई देना,
मिज़ाज जब से मेरा सूफ़ियाना हुआ है।

ये रचना भी पढ़ें

होली और रंगपंचमी पर लगने वाला डोल मेला 

2 thoughts on “आँसुओं का हिसाब रखे ज़माना हुआ…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *