बुढ़ापे की व्यथा

वृद्धाश्रम की बेंच पर अकेली बैठी एक बुजुर्ग महिला, हाथ में माला, चेहरे पर उदासी और आंखों में गहरी सोच, शांत और भावुक वातावरण।

रचना प्रतियोगिता के लिए नामिनेट है, कृपया अपनी राय इस पर जरूर दें. आपकी राय के अनुरूप पैनल निर्णय करेगा.

गायत्री बंका, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई

वृद्धाश्रम कीं बेंच पर,
बैठ बैठ कर सोचे ।
कहाँ कमी रह गयी-
मन दुविधा से खरोंचे ।।

पराये घर की बेटी को,
बुरा बोलूँ कैसे ।
जब अपना जाया ही मेरी –
गति करे वो ऐसे ।।

माँ का पल्ला थाम कर ,
बड़े हुये वो बच्चे ।
आज धन दौलत के आगे –
बन रहे कैसे सच्चे ।।

पोता बोले दादी को ,
मैं बनुंगा तेरा सहारा ।
पर दादी बोले माँ बाप को-
देना सुख तुम सारा ।।

मन भारी कर छोड़ चली ,
मन मे उठ रही टीस ।
एक गले में माला थी
बस उससे भर रही फ़ीस

दुनिया की है रीत अनोखी ,
माँ-बाप लगे अब बोझ ।
पर ये क्यूँ भूल जाते वो –
बुढ़ापा सतायेगा उन्हें एक रोज़ ।।

2 thoughts on “बुढ़ापे की व्यथा

  1. बहुत जरूरत है यह समझने की कि बुढ़ापे में रहने और खाने पीने का और दवा देखभाल का क्या प्रबंध है । हर मां को अपने पति और बच्चों से ही हर महीने अपने लिए जेब खर्च लेकर बैंक में रखना चाहिए। यह पैसा ही बुढ़ापे में काम आता है ।
    आपने व्यथा का सटीक वर्णन किया , समाधान के लिए हिम्मत करने के लिए उत्साहित करना ज़रूरी है ।
    अच्छे लेखन के लिए बधाई ।

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