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अपने ही रंग में रंग लो…

मोहे अपने ही रंग में रंग लो गिरधारी

अर्पणा सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, राँची झारखंड 

बीते माघ आइल फाग

चलत मदहोश फागुन बयार

रंग बिरंगी उड़े गुलाल

तन के तार छुए सब कोई 

मन के तार न भिंगोए कोई 

तुम अपने ही रंग में 

रंग लो गिरिधारी

तब मैं समझु होरी आई

भरी पिचकारी उड़त गुलाल

ना बा कौनो उमर के लिहाज़ 

बईठ मंडली बाजत ढोल मजिरा 

गावत है सब फाग

जोगिरा सा रा रा रा …..

सखियन संग मिली खेलत होली 

करत हुड़दंग मोरे मुख ना चढ़त कोई रंग 

अँखियाँ जिसको ढूँढत हैं 

वो नाहीं है संग 

दई द जगह अपनी नयनन में 

रंग द मोई के अपने ही रंग में 

रंग लो गिरधारी 

तब समझूँ मैं होली आई

जोगिरा सा रा रा …….

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