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मोहे अपने ही रंग में रंग लो गिरधारी

अपने ही रंग में रंग लो…

“मोहे अपने ही रंग में रंग लो गिरधारी” फागुन और होली के उल्लास में डूबी एक गहन आध्यात्मिक रचना है। यह कविता बाहरी रंगों की चंचलता से आगे बढ़कर उस दिव्य प्रेम की तलाश करती है, जो आत्मा को भीतर तक भिगो दे। ब्रज की होली, उड़ते गुलाल, ढोल-मंजीरे की थाप और सखियों की हंसी के बीच कवयित्री का मन केवल एक ही रंग चाहता है

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