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बदलता वक़्त…

बदलता वक़्त कविता में दर्शाई गई समाज की पीड़ा और इंसानियत का क्षरण समाज की स्याह सच्चाइयों को उजागर करती कविता बदलता वक़्त

सीमा शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा

ग़म की गहरी सुराही में ज़ख़्मों का
वो अथाह सागर जो भरा है।
किससे करें शिकायत आख़िर वो,
प्रेम का ढाई आख़र भी तो ख़रा है।

न हालात पर शर्मिंदगी हमें भाती,
वजूद अपना भी हौसलों से भरा है।
करे गुमान ये दुनिया जिस बात पर यूँ,
हर शख़्स यहाँ सहमा हुआ, बेहद डरा है।

न पूछो वो दर्द, टूटते-बदलते रिश्तों का,
वो ज़ख़्म उनका, जो आज भी हरा है।
लिए मुस्कुराहटें फिरता जो महफ़िल में,
ख़ुशी पर उसकी सिर्फ़ ग़मों का पहरा है।

कट रही इंसानियत, बढ़ रही हैवानियत जो,
रिश्ता आज अपने ही रिश्ते को खा रहा है।
न जाने कितनी ही मुस्कानों ने, सौरभ अपना,
अय्याशियों की ख़ातिर काट, ड्रमों में भरा है।

लाल हो रही है स्याही अख़बारों की जो आज,
बदलता वक़्त न जाने क्या-क्या करवा रहा है।

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