
नमिता सिन्हा, प्रसिद्ध लेखिका, बंगलुरू
अलार्म की तीखी आवाज़ नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारियों की आदत अनामिका को हर सुबह जगा देती थी। अँधेरी खिड़की के पास खड़ी वह कुछ पल अपने भीतर झाँकती क्या वह आज भी वही लड़की है, जो कभी सपनों से भरी आँखों के साथ शहर आई थी?
रसोई के चूल्हे की आँच पर दूध उबलता, साथ ही उसके मन में विचारों का ज्वार उठता। बच्चों की स्कूल ड्रेस, सास की दवाइयाँ, पति की फ़ाइलें इन सबके बीच कहीं वह खुद बिखर गई थी। ऑफिस की ऊँची इमारत में वह एक सक्षम अधिकारी थी. निर्णय लेने वाली, टीम को दिशा देने वाली। लेकिन घर लौटते ही उसकी पहचान फिर सीमित हो जाती.“सब संभालने वाली औरत।”
कई बार मीटिंग में उसकी बात दोहराने पर तालियाँ किसी और के लिए बजतीं। कई बार उसकी सफलता को “सहयोग” का नाम दे दिया जाता। वह चुप रहती, क्योंकि उसे मज़बूत कहलाना सिखाया गया था रोना नहीं।
एक रात, बेहद थकी हुई, उसने अपनी पुरानी डायरी खोली। पन्नों पर धुंधली लिखावट में दर्ज थे उसके सपने लेखिका बनने के, कुछ बदल देने के। उसकी आँखों से गिरते आँसू स्याही में मिल गए। उस पल उसने पहली बार अपने संघर्ष को स्वीकार किया।
उसने फिर लिखना शुरू किया।
हर शब्द में उसकी थकान थी, हर वाक्य में उसका विद्रोह। फिर उसने लिखा उन औरतों के बारे में, जो मुस्कुराते हुए अपने सपनों को रोज़ टाल देती हैं।
धीरे-धीरे उसकी रचनाएँ लोगों तक पहुँचने लगीं। कामकाजी महिलाएँ, गृहिणियाँ, छात्राएँ सबने उसमें अपनी परछाईं देखी। किसी ने कहा-“आपने मुझे फिर से अपने लिए जीना सिखा दिया।”
उस दिन अनामिका ने महसूस किया संघर्ष उसका अंत नहीं था,
वह उसकी रचना की शुरुआत था।
आज भी उसकी ज़िम्मेदारियाँ कम नहीं हुईं,
लेकिन अब वह खुद को पीछे नहीं छोड़ती।
क्योंकि नारी जब संघर्ष से गुजरती है,
तो वह टूटती नहीं
वह सृजन करती है।