
विजयलक्ष्मी सिंह, प्रसिद्ध लेखिका
तुम राज़दां हो मेरी, मेरी रहनुमाई करना।
विश्वास मेरा करना, बेख़ौफ़ हो के रहना।
हम चले थे सात जन्मों की क़सम खाकर,
लेकर तेरा सहारा, न डिगेंगे कठिन पथ पर।
तू बसी है मेरे मन में, अब कभी न डगमगाना।
तुम राज़दां हो मेरी, मेरी रहनुमाई करना।
है भरोसा तुम पे पूरा, तुम्हें हृदय से लगाया,
तेरा इश्क़ इस क़दर है, जो सुकून मैंने पाया।
तुम मुझे न आज़माना, बेख़ौफ़ हो के रहना।
तुम राज़दां हो मेरी, मेरी रहनुमाई करना।
ये सुख-दुःख हैं जो तेरे, मेरी आत्मा के नेरे,
तू आग़ोश में है मेरे, मेरा इश्क़ संग तेरे।
तुम प्रीत की रीत निभाना, बेख़ौफ़ हो के रहना।
तुम राज़दां हो मेरी, मेरी रहनुमाई करना।
दो शरीर, एक जान हैं तू मेरी आत्मा है।
छवि बस गई है मन में, अब जुदा कभी न होना।
तुम आराधना हमारी, करूँ पूजा मैं तुम्हारी।
तुम राज़दां हो मेरी, मेरी रहनुमाई करना।
मैं साध्य हूँ तुम्हारा, तुम साधिका हमारी।
योगी हूँ मैं तुम्हारा, तुम योगिनी हमारी।
निष्कपट, प्रेम निश्छल ही साधना हमारी।
तुम राज़दां हो मेरी, मेरी रहनुमाई करना।
विश्वास मेरा करना, बेख़ौफ़ हो के रहना।
अति सुंदर
Bahut sunder rachna🙏😊👌