
डॉ. आशासिंह सिकरवार, प्रसिद्ध लेखिका, अहमदाबाद
लड़कियाँ क्रिकेट खेल रही हैं,
खचाखच भरा है स्टेडियम।
लड़कियाँ बल्ला घुमा रही हैं,
लगा रही हैं चौके-छक्के।
लोग तालियाँ बजा रहे हैं।
हवा में छलांग लगाकर
पकड़ लेती हैं कैच,
पूरी ताक़त से गेंदबाज़ी करती हैं
और“आउट!”
अपनी देह को आग में तपाकर
मैदान में उतरी हैं।
“सौंदर्य के नए प्रतिमान”
गढ़ लिए हैं उन्होंने।
आत्मा प्रकाशित हो रही है उनकी,
बाज़ारवाद की साज़िशें
ध्वस्त हो गई हैं।
सपनों की चमक
आँखों में उतर आई है।
लड़कियाँ समझ चुकी हैं
खेल के नियम, कायदे-क़ानून,
हार-जीत का मतलब।
वे नाच रही हैं,
कूद रही हैं, हँस रही हैं,
गले लगा रही हैं।
वे रंगमंच पर
एक-दूजे को चूम रही हैं,
जाहिर कर रही हैं अपनी ख़ुशियाँ।
अपनी महत्त्वाकांक्षाओं पर
खरी उतर रही हैं।
वे तोड़ रही हैं तमाम पाबंदियाँ,
रख रही हैं
अपने अस्तित्व की ईंट।
वे आसमान से फूट रही हैं
सुबह की गोद में,
किरण बनकर।
प्रतिदिन संकल्पबद्ध,
अपनी भुजाओं को बलशाली बनाती हैं।
अष्टभुजाधारी, शक्ति-स्वरूपा
मन, मस्तिष्क और देह से
और अधिक ताक़तवर बन रही हैं।
लड़कियाँ बन गई हैं सबला।
बेख़ौफ़
दौड़ती हैं खाली सड़क पर।
वे पीछे मुड़कर नहीं देखतीं,
आगे देखती हैं।
अपनी निगाहें
आसमान पर टिकाए रखती हैं।
अंगारों पर चलती हुई
वे तोड़ रही हैं
लिंग-भेद के साँचे,
“चुनौतियों पर”
अपनी “फ़तेह” लिख रही हैं।
जीतकर रच रही हैं इतिहास।
हज़ारों-करोड़ों लड़कियों को
मिला है साहस
जो अभी तक
मैदान तक नहीं पहुँची हैं।
टीवी पर देखा है उन्होंने
सिर्फ़,
पर भीतर
हलचल हुई है।
खिड़की से
झाँक रही हैं उनकी आँखें
अपने लिए
एक टुकड़ा आकाश।
करोड़ों आँखों ने देखा, एक साथ
उगता सूरज।

बहुत सुंदर व सशक्त कविता
बहुत ही बेहतरीन कविता जो सोचन को एक दिशा प्रदान करती है